स्याही-सा फैला आसमान
स्याही-सा फैला आसमान
मैं रख लूँगा,
मुझे आदत है अँधेरों की,
तू सुबह रख ले।
रात की चादर में सिलते हुए
मैंने कई ख़ामोशियाँ ओढ़ी हैं,
तारों की बुझती रौशनी में
कुछ अपने ही साये जोड़े हैं।
मैंने सीखा है—
अँधेरों में भी रास्ते चलते हैं,
कभी चाँद की किरनें लेकर,
कभी मन की थकी धड़कनों से ।
रात की ओट में जो टूटे सपने हैं,
मैंने उन्हें चुपचाप समेटा है,
हर दर्द को अपनी हथेलियों पर
जैसे जुगनू कोई आख़िरी हो
वैसे ही सँभाला है।
अँधेरे मेरे साथ चलते हैं
बिना शिकायत, बिना शोर,
उनके बीच ही मैंने
ख़ुद को सबसे ज़्यादा सुना है।
तू सुबह को गले लगा लेना,
मैं रात का हिस्सा हूँ ,
तू उजाले के चमत्कार में
अपने लिए एक नई सुबह सजा लेना
मैं स्याही समेट लेता हूँ,
चल, स्याही-सा फैला आसमान
मैं रख लेता हूँ
मुझे आदत है अँधेरों की,
तू सुबह रख ले ।
— पारमिता षड़ंगी
