कविता

स्याही-सा फैला आसमान

स्याही-सा फैला आसमान
मैं रख लूँगा,
मुझे आदत है अँधेरों की,
तू सुबह रख ले।
रात की चादर में सिलते हुए
मैंने कई ख़ामोशियाँ ओढ़ी हैं,
तारों की बुझती रौशनी में
कुछ अपने ही साये जोड़े हैं।
मैंने सीखा है—
अँधेरों में भी रास्ते चलते हैं,
कभी चाँद की किरनें लेकर,
कभी मन की थकी धड़कनों से ।
रात की ओट में जो टूटे सपने हैं,
मैंने उन्हें चुपचाप समेटा है,
हर दर्द को अपनी हथेलियों पर
जैसे जुगनू कोई आख़िरी हो
वैसे ही सँभाला है।
अँधेरे मेरे साथ चलते हैं
बिना शिकायत, बिना शोर,
उनके बीच ही मैंने
ख़ुद को सबसे ज़्यादा सुना है।
तू सुबह को गले लगा लेना,
मैं रात का हिस्सा हूँ ,
तू उजाले के चमत्कार में
अपने लिए एक नई सुबह सजा लेना
मैं स्याही समेट लेता हूँ,
चल, स्याही-सा फैला आसमान
मैं रख लेता हूँ
मुझे आदत है अँधेरों की,
तू सुबह रख ले ।

— पारमिता षड़ंगी

पारमिता षड़ंगी

ओड़िआ साहित्य जगत म एक सुपरिचित नाम । वह अपनी आँचलिकता में सशक्त स्त्री-कथाकार एवं कवयित्री ही नहीं, कुशल ओड़िआ भाषानुवादक भी हैं। नारी मनस्तत्व की विश्लेषण, सूक्ष्म अवबोध की अन्वेषण तथा एक बलिष्ठ कहानी के आधार उनकी कहानियों को अलग परिचय देते हैं। जीवनवादी कहानीकार होते हुए भी पारमिता की कविताएँ चेतना और मानसिकता को खूब प्रभावित करती हैं। हिन्दी और ओड़िआ भाषा में कहानी, कविता लेखन में उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। अब तक उनकी 7 कहानी-संग्रह 5 कविता-संग्रह और 11 अनुवाद-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पारमिता की रचनाएँ वागर्थ, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, भाषा ,नूतन कहानियाँ, देशज, देशधारा, विश्वगाथा, कृति बहुमत, माटी ,कथाक्रम, कथारंग, अंतरंग, पाठ, युगवार्त , परिंदा, व्यंजना आदि अनेक सुप्रसिद्ध पत्रिका में प्रकाशित हुई होने के साथ साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विदेश में भी प्रकाशित हुई हैं। उनकी रचनाओं का बंगाली, राजस्थानी, मैथिली ,पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, ओड़िआ और इंग्लिश भाषा में अनुवाद किया गया है। पारमिता को उनके कहानी-संग्रह 'संबित के पास जब मैं नहीं थी' के लिए महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी की तरफ से पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। मुम्बई मो -9867113113