गृहस्थी की चक्की में
मैं जहाँ रहता हूँ वहाँ और भी लोग रहते हैं। ये ऐसे लोग हैं जो गरीब तो नहीं हैं लेकिन गरीब दिखना चाहते हैं। वैसे मेरे चेहरे को देखकर लोग मेरे ऊपर विश्वास नहीं करते। या शायद उनको अपना चेहरा देखकर भी खुद पर विश्वास नहीं होता होगा। अब पता नहीं मेरे साथ ऐसा होता है कि आपलोगों के साथ भी ऐसा होता है। मैं कह नहीं सकता। लेकिन जितने लोगों से मिला वे लोग कंफ्यूज रहे। जल्दी से उनको यकीन दिलाना जैसे सूर्य पर जीवण की तलाश करने के समान था। वैसे तो हमारा क्षेत्र कोयले के खदानों से घिरा है। हर दूसरा- तीसरा आदमी गरीब तो नहीं ही कहा जा सकता। लोग खाते कम हैं, पीते ज्यादा हैं। पी -पीकर उन्होंने शराब के कारोबार को गति दी है। कुछ बिके या ना बिके यहाँ दारू खूब बिकता है। सूद -ब्याज पर पैसे देने वालों के बल्ले-बल्ले हैं।
जिस जगह पर मैं हूँ मुझे लगता है कि वहाँ केवल गरीब लोग रहते हैं। उनकी गरीबी कुछ इस तरह की है कि वो छककर दारू पीते हैं। दारू की दुकान पर हजारों का दारू खरीदते और पीते हैं। लेकिन चखने की दुकान पर जाते ही गरीब हो जाते हैं। चखने वाले के यहाँ मोल- भाव करते हैं। महीने में एक लाख रूपये कमाते हैं। लेकिन दस दिन में पैसा स्वाहा हो जाता है। दारू नगद खरीदकर पीते हैं। लेकिन कपड़े भाड़े पर माँगते हैं। अब उनको कौन समझाए कि भाई ये नाटक कँपनी नहीं है। जो कपड़े भाड़े पर दें। कपड़े खरीदने जाते हैं। लेकिन पेमेंट के लिए हाॅटस्पाॅट चाहिए होता है। डाटा खरीद नहीं पाते। कपड़े किराए पर माँगते हैं।
तो मैं वैसी- ऐसी जगह पर था। जहाँ मुझे नहीं होना चाहिए था। फिर भी मैं ऐसी जगह पर था। मैं चाहता तो कहीं और भी हो सकता था। लेकिन मैं कहीं और नहीं था। मैं वहीं पर था। जहाँ मेरे पूवर्ज रहते आए थे। उस जगह का तिलस्म ऐसा था कि लोग खींचे चले आते थे। ये कोयला नगरी थी। उस जगह ने मुझे इतना ही दिया था, कि मैं केवल खा- पहन सकता था। कभी उस जगह से इतना नहीं कमा सका, कि कहीं एकड़-दो-एकड़ जमीन ले सकता था। एकड़- दो -एकड़ तो छोड़िए। एक इँच जमीन भी मैं नहींं खरीद सका। पैंतालीस के आसपास की उम्र है, लेकिन अपना और अपने कुटुँबा का पालन करता चला गया। कुछ बचाकर नहीं रख सका। या शायद बचा ही नहीं। अब ये मेरा खुला हाथ कह लीजिए। या शायद अच्छा खाने की आदत। सब रूपये खाने पर ही खर्च जा रहे हैं। बाकी जो बचता है वो दवाई और पढ़ाई पर खर्च हो जाता है। अब सरकार को मत दोष दीजिये। अपनी आदत खराब है। मोटा खा नहीं सकता। शुरू से महीन खाने की आदत रही है। हम ऐसे समय में जी रहें हैं। जहाँ हर चीज का दाम दहाई या सैकड़े में है। संचय सरकार की मेहरबानी से हो ना सका। इसलिए ये बहाना सोच लिया है। और इसी को अपनी गरीबी का कारण मानकर सँतोष कर रहा हूँ। कुछ इस तर्ज पर कि पूत सपूत तो धन काहे का। पूत कपूत तो धन काहे का। धन की तीन गतियाँ मुझे पता थीं। भोग, दान ,और नाश। भोगने लायक पूर्वजों ने छोड़ा नहीं था। कारण की वे भी इसी सिद्धांत पर चलते थे, कि पूत सपूत तो धन काहे का। और पूत कपूत तो धन काहे का। तीन- पाँच करने की आदत नहीं रही इसलिए निबाह करने भर कमा सका। दान करने की हैसियत सिक्कों अट्ठनियों से ज्यादा थी नहीं। लिहाजा इतना ही कर सका। नाश तब होता जब जमा कर के रखा होता है।
खैर, हालत ये है कि पिछले बीस सालों से गृहस्थी की चक्की में जुता हूँ। कभी कोई बड़ा कर्ज नहीं लिया। लेकिन कर्ज से मुक्त भी ना रह सका। महाजन बैताल की तरह गर्दन पर सालों से सवार हैं। साल के पहले दिन से साल के आखिरी दिन तक किसी ना किसी महाजन के छोटे -बड़े कर्जे को चुकाता रहा। एक कलम चुकाता हूँ, तो दूसरा कोई कलम आ जाता है। कर्ज खत्म होने का नाम ही नहीं लेता है। पुराना चुकाता हूँ , तो नए कर्ज में फँस जाता हूँ। संतोष ये है कि बच्चों को काॅन्वेंट में पढ़ा रहा हूँ। जिंदगी ऐसे गुजर रही है मानों स्टोलमेंट पर निकल रही है। सूरज बाद में क्षितिज पर चढ़ता है जिम्मेदारियाँ और जरूरतें सुरसा का रूप धरकर पहले आ जाती हैं। जिंदगी मानों स्टोलमेंट भरते निकल रही है। इस जन्म में तो नहीं लगता कि अपना मकान कहीं खरीद सकूँगा।
जो बच्चों की तरह थे या जिनको बच्चों की तरह पाला पोसा ( पँद्रह सत्रह सालों तक ) वो बीच रास्ते में छोड़कर चल दिए। उनकी शादी हो चुकी है। उनकी अपनी जिम्मेदारियाँ थीं। मैं भी उनके व्यक्तिगत पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता था। माँ- बाप अब अकेले मेरी खुद की जिम्मेदारी थे। वो सुविधाभोगी लोग थे। उनको माँ-बाप से असुविधा होने लगी। आठ लोगों की जिम्मेदारियों के साथ मैं डटा हुआ हूँ, अब भी मोर्चे पर ये सोचकर की युद्ध मैं ही जीतूँगा।
बीस सालों तक जिस गृहस्थी को चलाया। उसी में लोग बेईमन ठहरा रहे हैं। कहने लगे हैं हक मारने वाला हूँ। आज जब जेब खाली है और हाथ तँग है तो सोचता हूँ मैं ही बेवकूफ़ हूँ!
— महेश कुमार केशरी
