पहाड़ी ढलान का आख़िरी सूरज, अधूरे ख़्वाब का हमसफ़र
गाड़ी के रुकते ही धुएँ का एक भारी गुबार खिड़की के टूटे हुए शीशे से अंदर दाखिल हुआ। बस के ड्राइवर ने बिना मुड़कर देखे, रूखे स्वर में कहा “साब! कुंदनगढ़ आ गया।”
मैने जब बस से उतरकर अपने छोटे से लेदर बैग को कंधे पर डाला, तो चारों तरफ़ फैली कच्ची पगडंडियों, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों और एक खौफ़नाक सन्नाटे ने मेरा इस्तकबाल किया।
शहर के बड़े और आधुनिक मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई मुकम्मल करते वक्त ज़हन में सिर्फ़ बड़ी-बड़ी इमारतों, स्टेथोस्कोप, और जगमगाती आईसीयू मशीनों के ख़्वाब थे। फिर इंटर्नशिप खत्म होते ही सरकारी बॉन्ड का काग़ज़ सामने आ खड़ा हुआ—एक मुकर्रर वक्त के लिए देहाती और दूरदराज इलाके में खिदमत देना लाज़मी था। मजबूरी कहिए, कानून की पाबंदी कहिए या मेरी सोई हुई तकदीर, मैं अपना मुख्तसर सा सामान समेटकर इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र ‘कुंदनगढ़’ में आ पहुँचा।
यह इलाका पूरी तरह से पहाड़ी, पिछड़ा और आदिवासी समाज से जुड़ा हुआ था। दूर-दूर तक फैली घनी हरियाली के बीच मिट्टी, बाँस और लकड़ी के छोटे-छोटे छप्पर बिखरे पड़े थे। हालाँकि कुछ स्थानीय किसान और छोटे ज़मींदार भी यहाँ आबाद थे, लेकिन ज़िंदगी का तौर-तरीका बेहद बुनियादी और मुफ़लिसी से भरा था।
यहाँ नया-नया अस्पताल बना था,एक दो-मंज़िला सफ़ेद इमारत, जिसकी दीवारों से अभी भी ताज़ा चूने और सीमेंट की बू आ रही थी। इमारत तो खड़ी कर दी गई थी, मगर डॉक्टर, नर्स, कंपाउंडर और दूसरे स्टाफ की भर्ती अभी पूरी तरह नहीं हो पाई थी।
अस्पताल में क़दम रखते ही एक अजीब-सी वीरानी ने मुझे घेर लिया। ज़िला प्रशासन की तरफ़ से मुझे अस्पताल के पीछे एक छोटा सा कमरा दिया गया था, जिसमें एक लोहे की पुरानी खाट, एक लकड़ी की मेज़ और बुनियादी दवाइयों की कुछ पेटियाँ रखी थीं। पहले ही दिन अपनी बेबसी पर हँसी भी आई और गहरा अफ़सोस भी हुआ। ज़हन में तैरते बड़े-बड़े मेडिकल रिसर्च और यहाँ सामने फैला यह वीरान इलाक़ा मुझे शिद्दत से अहसास हुआ कि शायद मैं यहाँ हफ़्ते भर भी नहीं टिक पाऊंगा।
रात ढलते ही पहाड़ों पर अँधियारा ऐसा गहराता मानो सब कुछ निगल जाएगा। बिजली का कोई भरोसा नहीं था। शुरुआती कुछ दिन मैंने सिर्फ़ कैलेंडर पर दिन गिनने में गुज़ारे,कि कब यह मुक़र्रर वक़्त ख़त्म होगा और मैं वापस अपनी शहरी ज़िंदगी में लौटूँगा।
फिर एक रात, बारिश इतनी तेज़ हुई कि पहाड़ों से नीचे उतरने वाली कच्ची पगडंडियाँ पानी में बह गईं। बिजली गुल थी और मैं अपने छोटे से कमरे में लालटेन की मद्धम पीली रोशनी में मेडिकल जर्नल के पन्ने पलट रहा था।
तभी अस्पताल के भारी लकड़ी के दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हुई। ऐसा लगा जैसे कोई लकड़ी को तोड़े डाल रहा हो।
मैंने झटपट दरवाज़ा खोला। सामने कुंदनगढ़ का एक बूढ़ा आदिवासी किसान खड़ा था। कपड़े कीचड़ से सराबोर, पाँव नंगे और आँखों में एक ऐसी दहशत जो सिर्फ़ अपनों को खोने के डर से पैदा होती है। उसके पीछे दो-तीन गाँव वाले लकड़ी की एक खटिया पर कपड़े में लिपटी एक युवती को उठाए चले आ रहे थे।
“डॉक्टर साब! मेरी बेटी… सोमा… इसे बचा लो! सांस नहीं ले पा रही,” बूढ़े ने हाँपते हुए, ज़मीन पर गिरकर मेरे पैर पकड़ लिए।
मैं एक पल को बुरी तरह झिझक गया। न अस्पताल में पूरा स्टाफ था, न ऑक्सीजन सिलेंडर का बैकअप, न ही कोई सीनियर डॉक्टर जिससे सलाह ली जा सके। शहर के अस्पताल में ऐसे क्रिटिकल केस तुरंत इमरजेंसी या आईसीयू में रेफर कर दिए जाते थे। लेकिन यहाँ? यहाँ से चौबीस किलोमीटर दूर शहर पहुँचने से पहले ही उस लड़की की सांसें थम जातीं।
उस पल मेरे अंदर का घबराया हुआ नौजवान डॉक्टर हट गया और एक ज़िम्मेदार मसीहा जाग उठा। मैंने फ़ौरन टॉर्च की रोशनी में काम शुरू किया। फेफड़ों में पानी भर चुका था और निमोनिया का असर बेहद गहरा था। बुनियादी दवाइयों, सिरिंज और अपनी किताबी समझ के दम पर मैंने पूरी रात उस छोटे से कमरे में मौत से जंग लड़ी।
रात भर लालटेन की पीली रोशनी में मैं उसकी उखड़ती हुई सांसों पर नज़र टिकाए बैठा रहा।
सुबह की पहली सुनहरी किरण जब खिड़की के शीशे से छनकर अंदर आई, तो सोमा की साँसें हमवार (सामान्य) हो चुकी थीं। उसने धीरे से अपनी भारी पलकें उठाईं और मासूमियत से अपनी माँ और बाप की तरफ़ देखा।
बूढ़ा किसान कमरे के कोने में बैठा यह सब देख रहा था। जैसे ही उसे यकीन हुआ कि उसकी बेटी ठीक है, वह चुपचाप उठा, बाहर गया और कुछ देर बाद हाथ में ताज़े तोड़े हुए दो जंगली सेब और मकई की बालियाँ लेकर वापस आया।
उसने बिना कुछ कहे, बड़ी इज़्ज़त और ख़ामोशी के साथ वे सेब मेरी मेज़ पर रख दिए। उसकी आँखों में कोई बड़ा शुक्रिया अदा करने वाले अलफ़ाज़ नहीं थे, बस एक ऐसी नमी और अटूट यकीन था जो मैंने अपनी पूरी पढ़ाई के दौरान शहर की बड़ी-बड़ी फ़ीस देने वाले मरीज़ों की आँखों में कभी नहीं देखा था।
उस दिन मुझे समझ आया कि डॉक्टरी सिर्फ़ बड़ी मशीनों, एअर-कंडीशन्ड कमरों और आला डिग्रियों का नाम नहीं है। यह तो उस वक्त किसी के काम आने का नाम है, जब उसके पास उम्मीद की कोई दूसरी किरण न हो। शहर लौटने के सारे उतावले ख़याल धीरे-धीरे धुँधले पड़ने लगे।
हफ़्तों गुज़र गए। अस्पताल में मरीज़ों की आमद बढ़ने लगी थी, जिसकी वजह से महकमे ने एक नई नर्स की तैनाती की। उसका नाम शबनम था।
शबनम शहर की पढ़ी-लिखी, बेहद सलीक़ेमंद और शांत स्वभाव की लड़की थी। उसके आने से अस्पताल की वीरानी में जैसे किसी ने ताज़गी भर दी हो। वो कम बोलने वाली ज़रूर थी, लेकिन उसकी ख़ामोश आँखों में एक अजीब-सी कशिश और नज़ाकत थी। काम के दौरान उसकी फुर्ती, मरीज़ों के लिए उसकी हमदर्दी और मेरे हर इशारे को बिना कहे समझ लेने की सलाहियत ने मुझे बहुत प्रभावित किया।
दूसरी तरफ़ वही आदिवासी लड़की थी—’सोमा’। ठीक होने के बाद वो अक्सर अस्पताल की तरफ़ निकल आती। पहाड़ी ढलानों की तरह आज़ाद, मासूम और बेसाफ़्ता। उसकी सादगी और बेबाक हँसी में एक ऐसा खिंचाव था जो शहर की किसी बनावटी तहज़ीब में देखने को नहीं मिलता।
अस्पताल की मसरूफ़ियतों के बाद जब शाम ढलती, तो पहाड़ों पर एक जादुई ख़ामोशी उतर आती। उस ढलती शाम में हम तीनों अक्सर अस्पताल से थोड़ी दूर, पहाड़ी के एक ऐसे मोड़ पर जा बैठते जहाँ से पूरा गाँव और दूर बहती नदी साफ़ नज़र आती थी।
वहाँ बैठकर कुछ बातें अपनी होतीं, कुछ उनकी… ज़माने की फ़िक्र से दूर, हम तीनों जैसे एक अजीब और अटूट डोर से बंधे साथी बन गए थे।
शबनम अक्सर चाय का थरमस साथ लाती। वो मुस्कुराकर मुझे चाय का प्याला थमाती, और उसकी उँगलियों के हल्के से छुअन में एक अनकहा इज़हार होता। उसकी आँखों में मेरे लिए एक गहरा, ख़ामोश और सुलगता हुआ प्रेम साफ़ झलकता था। वो मेरी पढ़ाई, मेरी दुनिया, मेरी भाषा और मेरी थकान को बखूबी समझती थी।
लेकिन मेरा दिल… मेरा दिल तो किसी और दिशा में बहने लगा था।
जब सोमा अपनी तोतली और बेबाक ज़बान में पहाड़ों, जड़ी-बूटियों और परिंदों के किस्से सुनाती, उसकी आँखों में ढलते सूरज की किरणें चमकतीं, तो मैं अपनी पूरी हस्ती भूल जाता। उसकी बेपरवाह हँसी और उसका फितरी हुस्न मुझे अपनी तरफ़ ऐसे खींचता जैसे समंदर की लहरें साहिल को खींचती हैं। मैं धीरे-धीरे सोमा के मासूम प्रेम के समंदर में डूबने लगा था।
शबनम मेरी आँखों में सोमा के लिए उमड़ती दीवानगी को पढ़ लेती थी। उसकी आँखों में एक मद्धम-सी टीस तैर जाती, मगर उसने कभी अपने बर्ताव में कड़वाहट नहीं आने दी। हम तीनों का साथ एक ऐसी कशमकश बन गया था जहाँ प्यार, दोस्ती और ख़ामोश अहसासात एक-दूसरे में उलझ रहे थे।
शहर की जगमगाती बत्तियाँ और बड़े ख़्वाब अब मेरे ज़हन से मुकम्मल तौर पर मिट चुके थे।
दिन हफ़्तों में और हफ़्ते महीनों में ढलते चले गए। कुंदनगढ़ के पहाड़ों पर मौसम बदल रहा था कड़ाके की ठंड और घनी धुंध ने पूरे इलाके को अपनी आग़ोश में ले लिया था। लेकिन इस बेमुरव्वत मौसम के बीच, अनहोनी का एक ख़ौफ़नाक साया चुपचाप हमारी तरफ़ बढ़ रहा था।
वह एक भयानक और तूफ़ानी शाम थी।
अस्पताल में सन्नाटा था कि अचानक बाहर एक ट्रैक्टर का कानफोड़ू इंजन गर्ज उठा। ट्रैक्टर ट्रॉली के रुकते ही पागलों की तरह चिल्लाने और रोने की आवाज़ें गूँज उठीं। मैं और शबनम बदहवास बाहर भागे।
ट्रैक्टर की ट्रॉली में गीली पराली बिछी थी, और उस पर सोमा बेसुध पड़ी थी। उसका रंग पीला पड़ चुका था, और होंठ नीले पड़ रहे थे। पास ही बैठा उसका बूढ़ा बाप अपने सर को पीट-पीटकर रो रहा था—”डॉक्टर साब! मेरी बच्ची को बचा लो… काले नाग ने डस लिया!”
जंगल में लकड़ी चुनते वक्त एक ज़हरीले नाग ने सोमा के पाँव में डस लिया था। गाँव वालों ने ओझा और पारंपरिक जड़ी-बूटियों के चक्कर में कीमती वक्त गँवा दिया था। जब हालत बिगड़ी, तो शहर ले जाने के लिए कोई गाड़ी नहीं मिली। आख़िरकार वही पुराना ट्रैक्टर मिला। मगर शहर का ज़िला अस्पताल यहाँ से चालीस किलोमीटर दूर था—उस ख़राब, उबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते पर ट्रैक्टर से वहाँ तक पहुँचना सीधे मौत के मुँह में जाने जैसा था। रास्ता लंबा था और सोमा का वक्त बहुत कम।
हम फ़ौरन उसे अस्पताल के अंदर स्ट्रेचर पर ले आए। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं। ज़हर सोमा की रगो-रग में फैल चुका था। एंटी-वेनम की जितनी ख़ुराकें हमारे छोटे से अस्पताल में थीं, सब दे दी गईं, लेकिन शहर दूर होने की वजह से जो वक्त ज़ाया हुआ था, उसने ज़हर को दिल और फेफड़ों तक पहुँचने का पूरा मौका दे दिया था।
कमरे में लालटेन की पीली रोशनी काँप रही थी, बाहर मूसलाधार बारिश और बादलों की भीषण गर्जना थी। सोमा की सांसें उखड़ने लगी थीं। हर एक सांस के साथ उसका सीना तेज़ी से ऊपर-नीचे होता और फिर एक भारी खामोशी छा जाती।
मैं बेबसी से उसके पास बैठा था। मेरी एमबीबीएस की डिग्री, मेरी किताबी मालूमात और मेरी तमाम दवाइयाँ उस ज़हरीली रात के सामने पस्त हो चुकी थीं। मैं अपनी ज़िंदगी में पहली बार एक डॉक्टर के तौर पर इतना बेबस और लाचार महसूस कर रहा था।
अचानक, सोमा ने अपनी भारी होती पलकें उठाईं। उसकी धुँधली पड़ती आँखों में दर्द से ज़्यादा एक अजीब-सी शांति थी। उसने बहुत मुश्किल से अपना एक काँपता हुआ हाथ उठाया और मेरा हाथ थाम लिया। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ की तरह ठंडी हो चुकी थीं।
फिर उसने अपनी नज़र घुमाई और कोने में रोती हुई शबनम की तरफ़ देखा। सोमा ने मद्धम-सी इशारे से शबनम को पास बुलाया।
शबनम बिलखते हुए उसके पास घुटनों के बल बैठ गई। सोमा ने अपनी बची-कुची ताकत समेटी, शबनम का काँपता हुआ हाथ उठाया और उसे बहुत धीरे से मेरे हाथ पर रख दिया।
उसकी उखड़ती हुई आवाज़ में एक हल्की-सी सरगोशी उभरी—”डॉक्टर साब… मेरी दुनिया तो बस इस पहाड़ तक ही थी… लेकिन आपकी दुनिया बहुत बड़ी है। शबनम दीदी… इनका ख़याल रखना… इन्हें कभी अकेला मत छोड़ना…”
उसकी आँखों से आँसू का एक कतरा ढलका, जो उसके ठंडे गाल पर जम सा गया। उसने एक आख़िरी, लंबी सांस ली… और उसका सर एक तरफ़ ढुलक गया।
कमरे में एक सन्नाटा छा गया—एक ऐसा सन्नाटा जिसे बूढ़े बाप की चीखों ने भी नहीं तोड़ा।
शबनम ने अपना चेहरा मेरे हाथों में छुपा लिया और फूट-फूटकर रो पड़ी। मैं पत्थर की मूरत बना सोमा के ठंडे पड़ चुके चेहरे को देखता रहा। शहर का बड़ा डॉक्टर बनने का मेरा दंभ उस देहाती मासूम लड़की की लाश के सामने दम तोड़ चुका था।
सोमा चली गई थी, मगर मरते-मरते वो हम दोनों को एक ऐसे अटूट और पाकीज़ा बंधन में बाँध गई थी, जिसे ठुकराना अब किसी के बस में नहीं था।
कुछ महीनों बाद जब मेरा बॉन्ड का वक्त मुकम्मल हुआ और मैं कुंदनगढ़ से विदा होने लगा, तो सूरज की ढलती किरणें पहाड़ों को सुनहरा बना रही थीं। मैं अपना वही पुराना लेदर बैग उठाए अस्पताल की सीढ़ियाँ उतर रहा था, और मेरी उँगली शबनम के हाथ में थमी हुई थी।
पीछे छूटते पहाड़ों में सोमा की मासूमियत और मेरा पहला देहाती इश्क़ एक पवित्र इबादत की तरह हमेशा के लिए महक रहा था, जबकि शबनम का साथ सोमा की उस आख़िरी वसीयत और मेरी आने वाली ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत सच बन चुका था।
ज़िंदगी का यह अफ़साना मुझे सिखा गया था कि मोहब्बत सिर्फ़ पाने का नाम नहीं, बल्कि किसी की ख़ातिर सही वक्त पर अपनी जान तक न्योछावर कर देने और अपनों की भलाई के लिए सही रास्ता चुन लेने का नाम है। सोमा के इस दुनिया से चले जाने के बाद डॉक्टर ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाता कि एक डॉक्टर होकर भी वह उसे सही समय पर इलाज या एम्बुलेंस नहीं दे सका। वह शहर लौटकर एक बड़ा ‘रूरल मेडिकल केयर ट्रस्ट’ या अस्पताल शुरू करता है और उसका नाम ‘सोमा मेमोरियल केयर सेंटर’ रखता है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
