विस्मृत होते दिनों की सोंधी महक और दशहरा
बचपन की यादें किसी सहेज कर रखी गई धरोहर जैसी होती हैं, जिन्हें छू भर लेने से समय की कई परतें अपने आप उघड़ जाती हैं। हमारे बचपन का दशहरा केवल एक त्योहार नहीं था, बल्कि एक ऐसा जादुई उल्लास था जिसका इंतज़ार साल भर रहता था।
घर से कुछ ही दूरी पर जब रामलीला का मंचन शुरू होता, तो हमारा मन वहीं अँगड़ाइयाँ लेने लगता था। रात की वह ठंडी हवा, ढोल-नगाड़ों की गूँज और पूरी-पूरी रात जागकर रामलीला देखने का वह रोमांच आज भी दिल के किसी कोने में जीवंत है। सबसे बड़ी सहूलियत यह थी कि मामी का घर पास ही था; कथा देखते-देखते जब पलकें भारी होने लगतीं और नींद की चादर घेर लेती, तो हम मामी के घर जाकर निश्चिंत सो जाते थे।
दशहरे के दिन की शुरुआत ही एक अनोखी चेतना के साथ होती थी। सुबह-सुबह माँ की मीठी डाँट और दुलार से आँखें खुलती थीं— “जल्दी उठो, स्नान करो और पार्क जाकर नीलकंठ के दर्शन करके आओ।” उस समय का प्राकृतिक वातावरण इतना जीवंत और निर्मल था कि वह सुंदर पक्षी आसानी से दिखाई दे जाता था। आज विडंबना यह है कि ‘नीलकंठ’ का नाम तो ज़िंदा है, पर वह पक्षी अब इन आँखों से ओझल हो चुका है; वह केवल किताबों के पन्नों और पृष्ठों तक ही सिमट कर रह गया है। प्रकृति के उस खुलेपन के साथ जाने कितने ही सुंदर जीव-जंतु भी चुपचाप कहीं खो गए हैं।
दिन चढ़ने के साथ ही लखनऊ के ऐतिहासिक बेगम हजरत महल पार्क के मेले की रौनक देखने लायक होती थी। हाथ में उंगली थामे पिताजी के साथ जब उस मेले में पहुँचना होता था, तो हर खिलौना, हर ठेला एक नई दुनिया जैसा लगता था। विजयादशमी का वह दिन केवल रावण दहन तक सीमित नहीं था, बल्कि उसी दिन माँ दुर्गा का विसर्जन भी होता था। नदी के शांत जल में तैरते असंख्य दीपों का वह जगमगाता हुआ दृश्य किसी अलौकिक लोक का आभास कराता था। पानी पर थिरकते वे हज़ारों दीये और माँ को विदाई का वह भारी मन—सब कुछ कितना पवित्र था। आज समय बदला है, नदी के वे घाट बदले हैं और मूर्तियों के विसर्जन का वह संवेदनशील तरीका भी अब बहुत आक्रामक और वीरान सा हो गया है।
उस दौर में लोक-विश्वासों की भी अपनी एक अनोखी मिठास थी। उन दिनों घरों के आँगनों में बाँस और सुतली से बिनी चारपाइयाँ हुआ करती थीं। कभी-कभार जब उनमें कीड़े या खटमल लगने लगते, तो एक अचूक पारंपरिक उपाय आजमाया जाता था। रावण दहन के बाद उसकी लकड़ी (डंडी) को सहेजकर घर लाया जाता था। मान्यता थी कि इस लकड़ी को चारपाई में लगा देने से कीड़े-खटमल पास नहीं फटकते और यदि इसे तिजोरी में रख दिया जाए, तो साल भर बरकत बनी रहती है, धन की कमी नहीं होती। हर साल विजयादशमी पर यह लकड़ी बदली जाती थी। आज न वे सुतली की चारपाइयाँ रहीं, और न ही वे निश्छल लोक-विश्वास बचे।
आज के परिवेश को देखती हूँ तो मन एक अजीब सी कसक से भर उठता है। आज त्योहारों में शोर तो बहुत बढ़ गया है, डीजे और लाउडस्पीकरों का हंगामा है, चकाचौंध है; लेकिन वह आत्मिक सुकून, वह विशुद्ध भावनाएं और वह धार्मिक लगाव कहीं फीका पड़ गया है। जो पर्व कभी दिलों को जोड़ने और भक्ति में डूबने का जरिया हुआ करते थे, वे अब महज एक औपचारिकता और प्रदर्शन बनकर रह गए हैं।
जब उन बीते दिनों को मुड़कर देखती हूँ, तो ऐसा लगता है कि वह केवल एक बचपन नहीं था, बल्कि एक पूरी संस्कृति, एक पूरा संस्कार था—जो अब इतिहास सा स्मृतियों में ही सहेजा रह गया है।
— मंजूषा श्रीवास्तव ‘मृदुल’
