ग़ज़ल
राह उसकी तकूं मैं कब तक
और फ़ुऱ्क़त सहूं मैं कब तक
पलकों पे ठहरा हर इक आंसू
पूछे अब और रुकूं मैं कब तक
तन्हा तन्हा रातों में
और तारें गिनूं मैं कब तक
अबला पाई मुझसे पूछे
साथ तेरे चलूं मैं कब तक
फ़ुऱ्क़त की रातों में हर पल
याद उसको करूं मैं कब तक
— नमिता राकेश
