ग़ज़ल
नारी बनी है यूँ अग्नि अंदर बसाई आज की सीता।
देखो तो लड़ती है अपनी लड़ाई आज की सीता।।
सामना करती है रावणों के मिज़ाज़ का।
डर कर भागे नहीं देखो पढ़ाई आज की सीता।।
मुसीबतें अब कुछ भी नहीं वह चट्टान बनी।
साहसी शस्त्रों से गई सजाई आज की सीता।।
जीना घुट-घुटकर छोड़ा उसने कब से।
अपनाती है अब पूरी ढिठाई आज की सीता।।
बनी है नारी चुनौती अब सबके ही लिए।
बन मर्दानी करती है देख चढ़ाई आज की सीता।।
बरसती है मेघों-सी टंकार करती देखो।
बनकर आकाश सब पर छाई आज की सीता।।
तोड़ गुलामी का पिंजरा भरती उड़ान ऊँची।
ज़ुल्म नहीं सहती अड़ी बन सच्चाई आज की सीता।।
हर क्षेत्र में जमाती अपना ही अधिकार अब तो।
माँ दुर्गा की बन उभरी परछाई आज की सीता।।
सीता सबला बन साथ राम का देती रही।
नारी बनी कहे वही रीत अपनाई आज की सीता।।
घूँघट उतार समकक्ष मर्दों के वह आ गई।
बनी कल्याणी देती है दिखाई आज की सीता।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
