भाषा-साहित्य

डर के साये में “सिसकती क़लम”,साहित्य का उद्देश्य, एक निडर बेबाक आवाज़, एक निष्पक्ष दर्पण

साहित्य केवल शब्दों का ताना-बाना या अलंकारों की सजावट नहीं है बल्कि यह समाज की धड़कन, उसकी पीड़ा, उसकी आकांक्षाओं और उसकी चेतना का जीवंत दस्तावेज होता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज में असमानता, अन्याय और ख़ामोशी का सन्नाटा पसरा, तब-तब साहित्य की क़लम ने एक रोशनी की तरह राह दिखाई है, किंतु आज के दौर में जब हम अपने चारों ओर फ़ैले साहित्यिक परिदृश्य को देखते हैं तो मन में एक गहरा प्रश्न कौंधता है कि क्या हमारी क़लम आज भी समाज का निष्पक्ष आईना है। आज का समय साहित्यिक मंडी का समय बनता जा रहा है जहाँ कभी रचनाकार का मुख्य ध्येय सत्य की खोज और जन-सरोकार होता था, वहीं आज बहुसंख्यक लेखन का उद्देश्य महज़ छपना, वाहवाही बटोरना, पुरस्कार पाना या चंद तालियों की गूँज में ख़ुद को तसल्ली देना रह गया है। जब लेखक का उद्देश्य सत्य के स्थान पर सुविधा और प्रसिद्धि बन जाता है, तब क़लम से ठकुरसुहाती बातें निकलने लगती हैं और आज के दौर में ऐसा साहित्य बहुतायत में रचा जा रहा है जो किसी को चुभे नहीं, जो सत्ता या व्यवस्था से सवाल न करे, जो पाठकों को केवल एक भ्रमित सुकून दे, लेकिन जो साहित्य समाज को असहज़ न करे, जो सोई हुई चेतना को न झकझोरे, उसे वास्तव में साहित्य नहीं कहा जा सकता। सच्चाई लिखना कभी भी आसान नहीं रहा क्योंकि इसके लिए साहस और त्याग की आवश्यकता होती है, किंतु आज के समय में नाराज़गी का डर, साहित्यिक गुटबाज़ी से बाहर कर दिए जाने का भय और पुरस्कारों तथा मंचों से वंचित हो जाने की आशंका के कारण लेखकों ने अपनी क़लम की तल्ख़ी को खो दिया है। वे सच लिखने के बजाय उन विषयों को चुन रहे हैं जो पूरी तरह से सुरक्षित हैं और जब आईना ही धुंधला हो जाए या सच दिखाने से डरने लगे तो समाज भटकने लगता है। साहित्य का असली मक़सद तो समाज की सच्चाई को उजागर करना, लोगों के जज़्बात और दर्द को आवाज़ देना था, इसलिए साहित्य की असली ख़ूबसूरती किसी अलंकृत भाषा या सुंदर छंदों में नहीं बल्कि उसके अंदर धड़कती सच्चाई और ज़मीर की आवाज़ में होती है जो बिना किसी भय के, बिना किसी लालच के, आँख में आँख डालकर हक़ और सच का बयान करे। आज समय की माँग है कि हम आत्ममंथन करें और जो लेखक आज सिर्फ़ तात्कालिक प्रसिद्धि के पीछे भाग रहे हैं, उन्हें रुककर यह सोचना होगा कि आने वाली नस्लें उनके लिखे साहित्य का मूल्यांकन किस रूप में करेंगी, इसलिए हमें अपने भीतर के उस लेखक को पुनः जगाना होगा जो अप्रिय सच बोलने से न डरे, ज़मीर का सौदा करने से साफ़ इंकार करे और कमज़ोरों तथा पीड़ितों का संबल बने। यह संदेश केवल एक विचार नहीं बल्कि संपूर्ण साहित्यिक जगत के लिए एक चेतावनी और आह्वान है, इसलिए आइए हम सब मिलकर क़लम की खोई हुई गरिमा को बहाल करें और क़लम को केवल कागज़ काले करने का ज़रिया न बनाकर उसे समाज की सोई हुई चेतना को जगाने वाली मशाल बनाएँ तथा क़लम को फ़िर से ज़िंदा करें,ज़मीर की आवाज़ बनाकर, और सच की अटूट रोशनी बनाकर।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।

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