डिफॉल्ट

मन का दर्पण

दर्पण हमारे जीवन का हिस्सा है,
मगर मन का दर्पण पूर्ण स्वायत्त शुभचिंतक है
जिसे हम आप देखना नहीं चाहते 
देखते भी हैं, तो सच से मुँह चुराते हैं,
उसे झूठा बताकर अपनी पीठ थपथपाते हैं।
बस यही दोष है हमारा
या कहें तो जानबूझकर किया गया अपराध है 
जिसका दंड भी हम पाते हैं 
रोते, बिलबिलाते, बड़बड़ाते हैं, 
सारा दोष और ईश्वर को देते हैं 
खुद को बड़ा पाक साफ समझते हैं।
क्योंकि हम अपने मन के दर्पण को
पूरी तरह अपमानित उपेक्षित करते रहते हैं,
सिर्फ अपनी लीक पर ही चलते रहते हैं,
उस पर पड़े फूल हैं या काँटे
उसे रौंदकर आगे बढ़ना चाहते हैं 
और आए दिन मुँह की खाते रहते हैं।

सु

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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