विदेशी है “हाथ”
हर आंदोलन में विदेशी हाथ,
ये तो बहुत ही पुराना राग है।
जनता पूछ रहीं रोटी का प्रश्न,
किसी साज़िश का संवाद है।
देश के बच्चे बोले-शिक्षक दो,
हमारी कक्षाओं में जान नहीं।
इन हुक्मरानों ने कहा-“ठहरो,
इसमें भी कुछ “राज़” तो नहीं!
सड़क हैं टूटीं, स्कूल भी जर्जर,
बेरोज़गारी बेहिसाब-बेनक़ाब।
जनता जब भी आवाज़ उठाए,
खुलती है साज़िश की किताब।
यहाँ कभी विदेशी हाथ दिखेगा,
कभी विदेशी चाल भी मिलेगी।
अपने “घर” की आग बुझाने में,
यह दुनियाभर की ढाल मिलेगी।
— संजय एम तराणेकर
