वो बूढ़ी औरत
उस अनजान को देखकर हुआ मुझे दर्द,
देखा उन्हें तो लगा, दिल में छिपा है बहुत सारा दर्द।
आँखों में नमी, हाथों में बैसाखी, दिख रही थी बेसहारा,
ढूँढ रही थीं आँखें, किसी अपने का सहारा।
रास्ते के बीच बेहद हताश और परेशान,
न जाने कहाँ जाना था, थमे हुए थे पाँव तमाम।
देख उन्हें मन में उठे ढेरों सवाल,
क्या कोई नहीं था, रखने को उनका ख्याल?
उम्र के इस पड़ाव में क्यों अकेली थी?
क्या है कारण अकेलेपन का, ये एक पहेली थी।
क्या इनके अपने इनसे रूठे थे,
या फिर किस्मत के मारे अपनों से छूटे थे?
पूछने पर बयां नहीं कर पाई वो अपना हाल,
एक खामोशी में ही सिमट गया सारा मलाल।
देख उन्हें आँखें मेरी भर आईं,
नज़रों में उनकी आज भी उम्मीद थी छाई।
उम्मीद कि शायद कोई अपना पुकारेगा,
इस भीड़ में कोई तो हाथ थामने आएगा ।
— अनुपमा प्रधान
