कविता

वो बूढ़ी औरत

उस अनजान को देखकर हुआ मुझे दर्द,
देखा उन्हें तो लगा, दिल में छिपा है बहुत सारा दर्द।
आँखों में नमी, हाथों में बैसाखी, दिख रही थी बेसहारा,
ढूँढ रही थीं आँखें, किसी अपने का सहारा।
रास्ते के बीच बेहद हताश और परेशान,
न जाने कहाँ जाना था, थमे हुए थे पाँव तमाम।
देख उन्हें मन में उठे ढेरों सवाल,
क्या कोई नहीं था, रखने को उनका ख्याल?
उम्र के इस पड़ाव में क्यों अकेली थी?
क्या है कारण अकेलेपन का, ये एक पहेली थी।
क्या इनके अपने इनसे रूठे थे,
या फिर किस्मत के मारे अपनों से छूटे थे?
पूछने पर बयां नहीं कर पाई वो अपना हाल,
एक खामोशी में ही सिमट गया सारा मलाल।
देख उन्हें आँखें मेरी भर आईं,
नज़रों में उनकी आज भी उम्मीद थी छाई।
उम्मीद कि शायद कोई अपना पुकारेगा,
इस भीड़ में कोई तो हाथ थामने आएगा ।

— अनुपमा प्रधान

अनुपमा प्रधान

पिता - स्वर्गीय अर्जुन प्रधान प्राइमेरी शिक्षिका, आर्मी पब्लिक स्कूल हैप्पी वैली 37 Jhalupara Cantt East Khasi Hills Shillong, Meghalaya 793002 मोबाइल 8729987292 ईमेल anupamapradhan43855@gmail.com शैक्षिक योग्यता MA.BED English, BA Hindi Assam Rashtra Bhasha dwara

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