हास्य व्यंग्य

काश मैं एक संपादक होता!

काश मैं एक संपादक होता! तब साहित्य की दुनिया में मेरा भी जलवा होता। लेखक महीनों मेहनत करके रचना लिखते, रातों की नींद और दिन का चैन गंवाते, शब्दों को सँवारते, भावों को निखारते और उम्मीदों की गठरी बाँधकर मेरे दरवाजे पर दस्तक देते। मैं उनकी रचना पर एक सरसरी निगाह डालता, चेहरे पर गंभीरता का लेप लगाता और ऐसे सिर हिलाता, जैसे हिंदी साहित्य का भविष्य मेरे माथे की एक शिकन में अटका हुआ हो।

फिर मैं कहता, “आपकी रचना अच्छी है, लेकिन पत्रिका के स्तर के अनुरूप कुछ संशोधन आवश्यक हैं।”

यह वाक्य मेरा ब्रह्मास्त्र होता। इससे अच्छी-से-अच्छी रचना को कमजोर और कमजोर-से-कमजोर रचना को अपनी पसंद के अनुरूप बनाया जा सकता था। लेखक पूछता, “कौन-से संशोधन, सर?”

मैं कहता, “आप समझदार हैं, संकेत समझिए।”

बेचारा लेखक संकेत समझने के बजाय अपनी रचना समझने लगता। उसे क्या पता कि संपादकीय संकेतों का साहित्य से उतना ही संबंध है, जितना चुनावी घोषणापत्र का चुनाव जीतने के बाद किए गए काम से!

काश मैं एक संपादक होता, तो मेरे पास रचनाओं के चयन की एक महान लोकतांत्रिक व्यवस्था होती—जिसमें अंतिम निर्णय मेरा होता और जवाबदेही किसी की नहीं। पत्रिका में क्या छपेगा, किसका छपेगा, कब छपेगा और किसका कभी नहीं छपेगा, इसका निर्णय साहित्यिक गुणवत्ता से अधिक मेरे निजी समीकरण करते। मेरे मित्र की औसत कविता भी विशेषांक की शोभा बढ़ाती, मेरे शिष्य की साधारण कहानी को मैं नए कथा-विमर्श की शुरुआत घोषित कर देता और किसी अनजान लेखक की शानदार रचना मेरे संपादकीय विवेक के दरवाजे पर दम तोड़ देती।

कारण? रचना में दम तो था, लेकिन लेखक में पहचान नहीं थी!

आखिर साहित्य में प्रतिभा का भी कोई सामाजिक जीवन होता है। वह अकेली आती है तो प्रतीक्षा-सूची में डाल दी जाती है; सिफारिश लेकर आती है तो सीधे संपादकीय कक्ष में प्रवेश पाती है।

मैं संपादक होता, तो पत्रिका के मुखपृष्ठ पर साहित्य से अधिक अपने संबंधों को सजाता। जिनसे भविष्य में लाभ की उम्मीद होती, उन्हें प्रमुखता से प्रकाशित करता। जिनसे मंच, सम्मान, पुरस्कार या किसी बड़े आयोजन में कुर्सी मिलने की संभावना होती, उनकी रचनाओं को विशेष महत्व देता। और जो लेखक केवल लिखना जानते, मेरे दरबार में हाजिरी लगाना नहीं, उन्हें समझाता कि साहित्य में धैर्य बहुत जरूरी है।

यह नहीं बताता कि धैर्य लेखक के लिए है, संपादक के लिए नहीं!

मेरी पत्रिका में एक अद्भुत नियम होता—जो जितना बड़ा नाम, उसे उतनी छोटी रचना के लिए भी उतनी ही बड़ी जगह। बड़े लेखक की चार पंक्तियाँ संपादकीय गरिमा कहलातीं और नए लेखक के चार पृष्ठ संपादकीय अनुशासन का उल्लंघन। किसी प्रसिद्ध कवि की पुरानी कविता को ‘कालजयी’ बताकर पुनः प्रकाशित करता, लेकिन किसी नए कवि की ताजा और प्रभावशाली कविता को यह कहकर लौटा देता कि विषय में नवीनता का अभाव है।

नवीनता चाहिए भी तो कैसी? ऐसी, जिसे पहले से स्थापित लोग पहचान सकें और जिसका श्रेय अंततः उन्हीं को दिया जा सके!

काश मैं एक संपादक होता, तो मेरा संपादकीय पृष्ठ सबसे पवित्र स्थान होता। उसमें मैं साहित्य के पतन पर चिंता जताता, नए लेखकों की उपेक्षा पर आँसू बहाता, निष्पक्षता और पारदर्शिता की आवश्यकता पर गंभीर विचार रखता। लेकिन पत्रिका के अगले ही पन्ने पर अपने मित्रों की रचनाएँ छापता, अपने परिचितों के परिचय को आधा पृष्ठ देता और किसी प्रतिभाशाली अपरिचित लेखक को यह संदेश भेज देता—“आपकी रचना हमारे स्तर की नहीं है।”

मेरे सिद्धांत और मेरे व्यवहार के बीच इतना ही अंतर होता कि सिद्धांत छपते थे और व्यवहार बिकता था!

मैं संपादक होता, तो रचना प्रकाशित करने से पहले लेखक की साहित्यिक योग्यता के साथ उसकी सामाजिक उपयोगिता भी जाँचता। क्या वह मेरे कार्यक्रम में आ सकता है? क्या वह मेरी पुस्तक पर लिख सकता है? क्या वह मेरे सम्मान समारोह में प्रशस्ति-पाठ कर सकता है? क्या उसके पास कोई ऐसा संपर्क है, जिससे मेरा अगला विशेषांक प्रायोजित हो सके? यदि उत्तर सकारात्मक होते, तो रचना के गुण-दोषों पर विचार करने की आवश्यकता ही क्या थी!

और यदि लेखक कहता, “सर, मैं केवल लिखता हूँ, किसी गुट में शामिल नहीं हूँ,” तो मैं उसके साहित्यिक भविष्य के लिए दो मिनट का मौन रखता और फिर अगली रचना पढ़ने लगता।

मेरे लिए स्वतंत्र लेखक सबसे बड़ी संपादकीय चुनौती होते। वे न चापलूसी करते, न मेरी हर बात पर वाह-वाह कहते, न अपनी रचना छपने के बाद सार्वजनिक रूप से मेरी महानता का ढोल पीटते। वे अपनी रचना भेजते और उत्तर की प्रतीक्षा करते। ऐसे लेखकों को मैं बहुत खतरनाक मानता, क्योंकि वे संपादक को संपादक समझते थे, साहित्य का भगवान नहीं।

काश मैं एक संपादक होता, तो मेरी चुप्पी भी संपादकीय नीति कहलाती। किसी लेखक की रचना पसंद न आती, तो स्पष्ट कारण बताने के बजाय महीनों तक उत्तर नहीं देता। लेखक विनम्रता से पूछता, “सर, मेरी रचना का क्या हुआ?”

मैं जवाब देता, “देख रहे हैं।”

वह फिर पूछता, “कब तक निर्णय होगा?”

मैं कहता, “उचित समय पर।”

वह तीसरी बार पूछने का साहस करता, तो उसकी रचना के साथ उसका नाम भी मेरी स्मृति से मिट जाता। आखिर संपादक की व्यस्तता का भी सम्मान होना चाहिए। लेखक की रचना भले ही दो हजार शब्दों की हो, उसे पढ़ने के लिए समय चाहिए; लेकिन लेखक को अनिश्चितता में रखने के लिए समय की कोई कमी नहीं होती!

और यदि किसी लेखक की रचना प्रकाशित करनी ही पड़ती, तो मैं उसके शीर्षक में परिवर्तन करता, दो-चार वाक्य काटता, कुछ शब्द जोड़ता और फिर उसे इस तरह प्रकाशित करता, मानो मेरी संपादकीय कैंची के बिना वह रचना साहित्य के दरवाजे तक पहुँच ही नहीं सकती थी। लेखक धन्यवाद देता, तो मैं मुस्कराकर कहता, “आपकी रचना में बहुत संभावनाएँ थीं।”

मन ही मन सोचता—संभावनाएँ तुम्हारी थीं, लेकिन प्रतिष्ठा मेरी बढ़ी!

काश मैं एक संपादक होता, तो विशेषांकों का भी अपना गणित बनाता। विषय घोषित करता—‘समकालीन साहित्य में नए हस्ताक्षर’। फिर उसमें उन्हीं पुराने हस्ताक्षरों को छापता, जो हर विशेषांक में अपना हस्ताक्षर छोड़ जाते हैं। युवा लेखकों पर केंद्रित अंक निकालता, लेकिन उसमें युवाओं की जगह उन वरिष्ठों को देता जो युवाओं की ओर से बोलने का अनुभव रखते हैं। स्त्री-विमर्श पर अंक निकालता और महिलाओं की रचनाओं से अधिक पुरुषों के संपादकीय विचार प्रकाशित करता। दलित साहित्य पर चर्चा करता और दलित लेखकों को समझाता कि उनकी रचनाओं को किस तरह लिखा जाना चाहिए।

इस तरह मैं हर उस आवाज का संरक्षक बन जाता, जिसे सुनने से पहले उसकी आवाज पर अपना संपादकीय नियंत्रण स्थापित करना जरूरी समझता!

मेरी पत्रिका में विज्ञापन भी साहित्यिक गरिमा के साथ प्रकाशित होते। जो विज्ञापन देता, उसकी रचना को विशेष महत्व मिलता; जो केवल रचना देता, उसे संपादकीय व्यस्तता का हवाला मिलता। मैं इसे कभी आर्थिक लेन-देन नहीं कहता। इसे कहता—‘साहित्यिक सहयोग’।

यदि कोई पूछता कि साहित्य और विज्ञापन का यह कैसा संबंध है, तो मैं गंभीर होकर कहता, “पत्रिका चलाना आसान नहीं है। साहित्य के लिए संसाधन चाहिए।”

बात सही थी। बस समस्या यह थी कि संसाधन जुटाते-जुटाते कहीं साहित्य ही संसाधन न बन जाए!

मैं संपादक होता, तो हर प्रकाशित लेखक से अपेक्षा करता कि वह पत्रिका का प्रचार करे, अंक की तस्वीर साझा करे, संपादक की प्रशंसा करे और दूसरों को भी सदस्य बनाए। लेखक रचना लिखे, प्रूफ पढ़े, प्रचार करे, पाठक जुटाए और कभी-कभी आर्थिक सहयोग भी दे। बदले में उसे क्या मिलता? एक प्रकाशित प्रति, संपादक का आशीर्वाद और अगले अंक में छपने की अनिश्चित आशा।

मैं गर्व से कहता, “हम लेखकों को मंच प्रदान करते हैं।”

लेखक मन ही मन पूछता—“मंच तो ठीक है, लेकिन उस पर खड़े होने के लिए हर बार आपकी अनुमति क्यों चाहिए?”

काश मैं एक संपादक होता, तो अपने परिचय में लिखता—‘साहित्य के प्रति समर्पित, निष्पक्ष, निर्भीक और प्रतिबद्ध संपादक।’ अपने संपादकीय में लिखता—‘हम प्रतिभा के सम्मान और नए रचनाकारों को अवसर देने के लिए संकल्पबद्ध हैं।’ अपने भाषण में कहता—‘साहित्य किसी गुट, जाति, भाषा या विचारधारा की निजी संपत्ति नहीं है।’

फिर अपनी मेज पर रखी रचनाओं में से सबसे पहले उसी लेखक की रचना निकालता, जिसने पिछली शाम मेरे संदेश का उत्तर सबसे जल्दी दिया था।

क्योंकि विचारों की दुनिया में मैं जितना स्वतंत्र था, व्यवहार की दुनिया में उतना ही सुविधानुसार बँधा हुआ!

लेकिन एक दिन कोई लेखक मेरी पत्रिका से निराश होकर लौट जाता। वह दूसरी पत्रिका में छपता, फिर तीसरी में। धीरे-धीरे पाठक उसे पहचानने लगते। उसकी रचना पर चर्चा होने लगती। वह बिना मेरे प्रमाणपत्र के अपनी जगह बना लेता। तब मेरे संपादकीय साम्राज्य की दीवारों में पहली दरार पड़ती।

मैं कहता, “आजकल साहित्य में गुणवत्ता से अधिक प्रचार चलता है।”

लेकिन भीतर से एक आवाज आती—“या फिर तुम्हारे दरवाजे पर गुणवत्ता से अधिक पहचान चलती थी?”

मैं उस आवाज को दबाने के लिए अगला संपादकीय लिखने बैठ जाता।

आखिर संपादक की कलम में इतनी शक्ति तो होनी ही चाहिए कि वह दूसरों की आवाजों को छाँट सके। मगर क्या इतनी शक्ति भी होनी चाहिए कि वह अपनी सुविधाओं को साहित्य का मानदंड घोषित कर दे?

संपादक होना केवल छापने का अधिकार नहीं, न छापने के निर्णय की जवाबदेही भी है। किसी रचना को अस्वीकार करना अपराध नहीं; बिना पढ़े अस्वीकार करना, पक्षपात से चुनना और निजी स्वार्थ को साहित्यिक कसौटी बताना जरूर गंभीर प्रश्न हैं।

फिर भी मन कहता है—काश मैं एक संपादक होता!

मैं चाहता कि लेखक मेरी पत्रिका में छपने के लिए बेचैन रहें, मेरे उत्तर की प्रतीक्षा करें, मेरी स्वीकृति को उपलब्धि समझें और मेरी अस्वीकृति को अपनी कमी मान लें। मेरी मेज पर उनकी रचनाएँ ढेर हों और मेरे पास उनकी उम्मीदों की चाबी।

लेकिन एक दिन मुझे यह भी याद रखना पड़ता कि संपादक की मेज पर रखी हर पांडुलिपि किसी की मेहनत है, किसी का सपना है, किसी की कई रातों की जाग है। उसे पढ़ना मेरा दायित्व है, उस पर निर्णय देना मेरा अधिकार; मगर लेखक की गरिमा को अपनी कुर्सी से छोटा समझना मेरा अधिकार नहीं।

क्योंकि संपादक पत्रिका का मालिक हो सकता है, साहित्य का मालिक नहीं।

और अब तो मेरी इच्छा कुछ और बड़ी हो गई है। मैं ऐसा संपादक बनना चाहता हूँ कि लेखक मेरी पत्रिका में छपने के बाद लेखक कहलाएँ, मेरे बिना छपने वाले लोग केवल रचनाकार बने रहें और मेरे विरोधी साहित्य की मुख्यधारा से बाहर घोषित कर दिए जाएँ।

आखिर संपादक की असली ताकत उसकी कलम में नहीं, उस भ्रम में है कि उसके बिना किसी की कलम चल ही नहीं सकती!

काश मैं एक संपादक होता—तो कम-से-कम दूसरों की रचनाएँ छाँटते-छाँटते अपनी आत्मा को संपादित करना तो सीख ही जाता!

लेकिन डर है कि कहीं ऐसा न हो कि एक दिन साहित्य मेरा संपादकीय पढ़े और मेरी ही जिंदगी पर लाल निशान लगाकर लिख दे—

“रचना अस्वीकृत। कारण: संपादक में साहित्य से अधिक स्वयं को प्रकाशित करने की प्रवृत्ति पाई गई।”

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

राजभाषा अधिकारी एनएमडीसी [भारत सरकार का एक उपक्रम] प्रशासनिक कार्यालय, डीआईओएम, दोणीमलै टाउनशिप जिला बेल्लारी - 583118 मो.-8759411563

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