आओ मन के आंगन में दीप जलाएं
दीप जले तो केवल घर में, मन में भी उजियारा हो,
हर चेहरे पर हर्ष खिले, हर आँगन सुखधारा हो।
मिट्टी के दीपों से बढ़कर, सद्भावों की ज्योति जलाएँ,
मन के भीतर छिपे अँधेरों को,प्रेम-प्रकाश दूर भगाएँ।
धन-दौलत से बड़ा जगत में, मानवता का मान रहे,
भूखे के अधरों पर मुस्कान, यही हमारा दान रहे।
नहीं किसी का मन दुखाएँ, ऐसा अपना व्यवहार हो,
रूठे रिश्तों को जोड़ सकें, इतना निर्मल प्यार हो।
स्वच्छ धरा और निर्मल नभ का, संकल्प हृदय में धारें,
प्रकृति की अनमोल धरोहर को, मिलकर सदा सँवारें।
ईर्ष्या-द्वेष मिटाकर मन से,प्रेम-सुमन बरसाएँ,
सत्य, करुणा और परोपकार के,दीप निरंतर जलाएँ।
आओ ऐसी दीपावली मनाएँ,जिसका संदेश महान हो,
हर घर में खुशियाँ, हर हृदय में,मानवता का सम्मान हो !
— गोपाल कौशल भोजवाल
