परहित सरिस धर्म नहीं भाई
हम कदम ऐसा चले कि निशान बन जायें और काम ऐसा करें कि पहचान बन जायें। वह यहाँ जिंदगी तो सभी जी लेते हैं मगर जिन्दगी ऐसी जीओ कि हम सबके लिए मिसाल बन जायें।
हमारा जीवन है वह जीवन में और बातों के साथ-साथ एक और पहलू परोपकार है। वह जो मन: संतुष्टि का आधार है। यह साथ ही साथ धार्मिक वृत्ति का भी एक प्रकार है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी सटीक कहा है कि परहित सरिस धर्म नहीं भाई। वह यानि सबसे बड़ा धर्म दूसरों की भलाई है। अपने हित के लिए तो दुनियां में सभी जीते हैं। वह दूसरों के लिए जीने वाले जीवन का अमृत पीते हैं। वह जो यह सदा दूजों की भलाई की बात पर हित सोचता है व उसके जीवन के मूलगुणों की कभी घात नहीं होती है। वह सदा परोपकार के वैभव से सम्पन्न व धनवान बने रहते हैं। यही सचमुच में हर महान व्यक्ति की पहचान होती है। परोपकार एक ऐसी औषधि है जीसके सेवन से ईर्ष्या, द्वेष ,अहंकार आदि जैसी कोई बीमारी नहीं होती है। अपने लिए तो हर कोई जीते हैं। वह सुख सुविधा के अनेक प्रयास से साधन जुटाते है। वह औरों के लिए जो जिए उस पर ईश्वर भी अपनी करुणा लुटाते हैं। हमारे सामने परोपकार का जीता जागता उदाहरण युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी हैं। वह जन-जन के कल्याण हेतु रात दिन श्रम करते है और उन्हें सन्मार्ग दिखाते हैं। हमारे जीवन में अगर परोपकार का स्रोत बहेगा तो मान के चले उसके जीवन में प्रतिपल सुख और शांति का उमड़ता सागर है। शास्त्रानुसार भी पर सेवा हमारे जीवन की पवित्र कमाई है। हम अपनों की सेवा करें, कोई बड़ी बात नहीं हैं। पीड़ित मानवता की निष्काम सेवा करना ही असली कमाई है। हम यह याद रखें सृष्टि में सिर्फ इन्सान को ही ईश्वरीय मन मिला है जिसमें सहानुभूति का कमल खिल सकता है। वह हम इसका यथोचित उचित उपयोग करें जिससे आधिकाधिक लोग लाभान्वित हों। हम जब किसी की दिल से सेवा – सहायता करते हैं तो स्वतः ही हमारा दिल विशाल होने लगता है। वह कमाल होता है। अद्भुत आंतरिक शांति मिलने लगती है। वह आनंदाभूति और खुशी की प्राप्ति होती है। अतः मानवोचित है कि हम अपने प्राप्त क्षमता, ज्ञान, प्रतिभा आदि का उपयोग दूसरों की सेवा और भलाई के लिए भी करें। यानि हम दूसरों के लिए भी जिएं। हम अपने जीवन में परोपकार का अभ्यास करें और जीवन में नई उमंग, उत्साह और खुशियों आदि के नए – नए रंग भरे। वह किसी के जीवनचर्या में परोपकार आदि बहुत बड़ी थाती है। अतः हम कभी भी भलाई के काम को छोटा न समझें। यह निष्काम भाव से करते जाएँ जो मोटा अदृश्य लाभ है। वह पर-कारज को प्राथमिकता देते वे बहुत बड़ी कमाई कर लेते हैं। ऐसे कर्म
दूजों के दिलों में सदा-सदा के लिए जगह बना लेते हैं। वह उनके मूक कृतज्ञ भावों से जीवन सराबोर कर लेते हैं। एक पुरातन कहावत है परहित सरिस धर्म नहीं भाई। वह यह कहना अतिशयोक्ति नहीं हैं कि परहित सरिस कर्म नहीं भाई।
— प्रदीप छाजेड़
