गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

छल-छद्म जब कम होता है,
तभी कर्म उत्तम होता है।

नही कोई उपमेय किसी से,
नाम वही अनुपम होता है।

सूरज से आतप्त धरा पर,
न जाने क्यों तम होता है।

सच तो पीड़ित ही रह जाता,
झूठों का परचम होता है।

सारी कोशिश चुप रखने की,
क्या ऐसा हमदम होता है।

कुटिल कुचाली बर्बरता से,
कहां कोई प्रियतम होता है।

क्षणभंगुर लगता है प्रतिक्षण,
जीवन तो लघुतम होता है।

शिखरों से क्या लड़ पाएगा,
जन – मन तो बेदम होता है।

नफ़रत की राहों पर चलकर,
आखिर किसको ग़म होता है।

— वाई. वेद प्रकाश

वाई. वेद प्रकाश

द्वारा विद्या रमण फाउण्डेशन 121, शंकर नगर,मुराई बाग,डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207 M-9670040890

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