पूछ रही है धरती माता
पूछ रही है धरती माता।
आखिर तुमको क्या है आता।।
बेशर्मी से जीना सीखे।
अंधे बहरे नाहक चीखे।।
मर्यादा को निशदिन तोड़ो।
जीवन अपना क्यों तुम मोड़ो।।
ईर्ष्या दंभ भूल कब माने।
सबसे ऊपर खुद को जाने।।
लोक लाज पीकर हो बैठे।
फिर भी हरदम रहते ऐंठे।।
दुनिया सुनती रोज कहानी।
जाने कैसा दाना -पानी।।
अच्छा होगा दूर ही रहना।
तुमसे कोसों बचकर चलना।।
जैसा पहने हो तुम गहना।
उससे उत्तम होगा मरना।।
