कविता

खामोश आंखें

जाने किस तलाश मे थी, वो खामोश आंखें
सोच रही थी अपने अतीत के बारे मे, या सहमी थी
भविष्य की सोचकर।
ठहरी सी लगती थी
किसी विनाश लीला के बाद के मंजर की तरहा।
लिये हुए गहरी खामोशी अजीब सा सूनापन।
या फिर देख रही थी
जमाने की सबसे बडी
सबसे कडवी सच्चाई को।
महसूस कर रहीं थी
बुढापे की लाचारी को।
वो पथराई सी आंखे॥

या तलाश रही थी
भीड भरी दुनियां मे, किसी अपने को
जो छोड गये रिश्तों को
बोझ का दलदल समझकर।
निहार रही थी
रिश्तो की बेदर्द दुनियां को
जहां सिर्फ शायद
एक ही रिश्ता बचा है
व्यापार का रिश्ता
फिर भी ना जाने क्यूं
वो बूढी आंखे, ढूढती है अब भी रिश्तों को,
उन निढाल आंखो की बेबसी
दिल पर मानो तीर चला रही थी
करा रही थी सहसास
उस असहनीय खामोश दर्द का
जो मिलता है अपनो से
ढलती उम्र के अंतिम पडाव पर…..

सतीश बंसल

*सतीश बंसल

पिता का नाम : श्री श्री निवास बंसल जन्म स्थान : ग्राम- घिटौरा, जिला - बागपत (उत्तर प्रदेश) वर्तमान निवास : पंडितवाडी, देहरादून फोन : 09368463261 जन्म तिथि : 02-09-1968 : B.A 1990 CCS University Meerut (UP) लेखन : हिन्दी कविता एवं गीत प्रकाशित पुस्तकें : " गुनगुनांने लगीं खामोशियां" "चलो गुनगुनाएँ" , "कवि नही हूँ मैं", "संस्कार के दीप" एवं "रोशनी के लिए" विषय : सभी सामाजिक, राजनैतिक, सामयिक, बेटी बचाव, गौ हत्या, प्रकृति, पारिवारिक रिश्ते , आध्यात्मिक, देश भक्ति, वीर रस एवं प्रेम गीत.