गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मुहब्बत से हमें जबसे मुहब्बत हो गई है.
तभी से नफरतों से और नफरत हो गई है.

“अगर सच कह नहीं पाते तो कहिये झूठ भी मत”
बस इतनी बात बोली थी, अदावत हो गई है.

खयाल आने लगे हैं खूबसूरत जब से दिल में,
हमारी ज़िन्दगी भी खूबसूरत हो गई है.

वे बोले-बढ़ गये हैं काम घर के और ज़्यादा,
रिटायर होके सोचा था कि फुर्सत हो गई है.

नहीं है सल्तनत तो क्या, हैं फिर भी बादशाह हम
दिलों पर सबके अपनी बादशाहत हो गई है.

वो लड़ते हैं तो मुझसे प्यार करते और ज़्यादा,
तभी तो मेरी भी लड़ने की आदत हो गई है.

किसी की साइकिल से लड़ गई थी एक बाइक,
अलग दोनों के मज़हब थे सियासत हो गई है.

किसी ने खर्च की है प्यार की जितनी भी दौलत,
तो उसके पास उससे दूनी दौलत हो गई है.

वो करके बेईमानी जब न कुर्सी पा सके तो,
सभी से कहते उनके सँग सियासत हो गई है.

सुबह उठ कर लिये माँ-बाप के दर्शन भी जिसने,
बिना मन्दिर गये उसकी इबादत हो गई है.

— डॉ कमलेश द्विवेदी

One thought on “ग़ज़ल

  • विजय कुमार सिंघल

    बेहतरीन ग़ज़ल !

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