धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

चलो, स्वाध्याय करें

ओ३म्

हमारा जहां तक ज्ञान है उसके अनुसार संसार में केवल वैदिक मत ही एकमात्र ऐसा धर्म वा मत है जहां प्रत्येक मनुष्य को वेद आदि सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय को नित्य कर्तव्य कर्मों से जोड़ा गया है। वैदिक काल में प्रमुख ग्रन्थ चार वेद’ थे और आज भी संसार के साहित्य में चार वेद ही ज्ञान का आदि स्रोत है। इनकी समानता का संसार में कोई ग्रन्थ नहीं है। सृष्टि के आदि काल से ऋषियों की परम्परा में वेदों को ईश्वरीय ज्ञान माना गया है। महाभारत काल के बाद वैदिक धर्म व संस्कृति का पतन हुआ व इसमें अन्धविश्वास, पाखण्ड व कुरीतियां सम्मिलित हो गईं। इसका कारण हमारे द्विज लोगों का आलस्य व प्रमाद था। वेदों के अनुसार चार वर्ण होते हैं जिसमें ब्राह्मण वर्ण का यह कर्तव्य था कि वह निष्कारण अर्थात् बिना हानि लाभ का विचार करे ही वेदों का अध्ययन व प्रचार करे। संसार में ज्ञान से महत्वपूर्ण अन्य कोई वस्तु व धन सम्पदा नहीं है। ज्ञान अमृत के समान है जो मनुष्य की मृत्यु होने पर भी संस्कार के रूप में आत्मा पर अंकित रहने के कारण परजन्म में साथ जाता है और वहां भी यह हमारा कल्याण करने के साथ हमें सुख पहुंचाता है। महाभारत काल के बाद की परिस्थितियों में हमारे ब्राह्मण वर्ण के लोगों ने वेदों की रक्षा के उपाय जो सृष्टि के आरम्भ से चले आ रहे थे, उनमें आलस्य व प्रमाद किया जिससे वेदों के सत्यार्थ विलुप्त होना आरम्भ हो गये जो समय के साथ-साथ बढ़ते रहे। वेद के सत्यार्थ लुप्त होने पर समाज में अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियां, अज्ञान व अविद्या ने पैर पसारे और समाज दिन प्रतिदिन ज्ञान से दूर होकर अज्ञान रूपी अन्धकार से ग्रस्त हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि तत्कालीन वेद मनीषियों ने वेद के मिथ्यार्थ कर यज्ञों में पशु हिंसा को प्रारम्भ किया और सम्भव है कि कुछ लोगों ने  मांसाहार करना भी आरम्भ किया होगा।

समाज में अन्य कुप्रथायें भी स्वाभाविक रूप से आरम्भ हुईं जिसमें गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वैदिक वर्ण व्यवस्था का स्थान जन्मना जातिवाद ने ले लिया। इस व्यवस्था के कारण ब्राह्मण कुल में उत्पन्न अज्ञानी व शूद्र स्वभाव वाला व्यक्ति भी ब्राह्मण होता था और स्त्री व शूद्रों के लिए ज्ञान प्राप्ति के रास्ते बन्द कर दिये गये थे। जब ब्राह्मण वेदों से अनभिज्ञ हुए तो क्षत्रिय व वैश्यों की भी शिक्षा व विद्या भी दिन प्रतिदिन न्यून व समाप्त प्रायः होती गई। इसी की परिणीति कालान्तर में अल्प संख्या व शक्ति वाले विधर्मियों से आर्य हिन्दू राजाओं की पराजय व आर्य जनता की उनकी गुलामी के रूप में सामने आई। आर्य हिन्दुओं का धर्मान्तरण व विधर्मी बनाना भी इस अज्ञान व अविद्या के कारण ही हुआ। यदि विद्या के रक्षक हमारे ब्राह्मणों ने आलस्य व प्रमाद न किया होता तो आज वैदिक धर्म और संस्कृति पर जो खतरे मंडरा रहे हैं, वह स्थिति न आई होती। सारे विश्व में वेदों का प्रचार व वैदिक धर्म का पालन हो रहा होता। आश्चर्य है कि ऋषि दयानन्द के द्वारा सत्यार्थयुक्त वेदभाष्य सहित सत्यार्थप्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका जैसे युगान्तरकारी ग्रन्थ देने पर भी मूढ़ बन्धुओं ने उन्हें अपनाया नहीं और अविद्या व अज्ञान पर आधारित अन्धविश्वासों व पाखण्ड आदि का सेवन करते जा रहे हैं।

महर्षि पतंजलि ने सहस्रों वर्ष पूर्व महाभारत काल से भी पूर्व योग दर्शन’ का प्रणयन किया है। अष्टांग योग के प्रथम दो अंग यम और नियम हैं जिन्हें समस्त संसार स्वीकार करता है। यम पांच हैं और नियम भी पांच हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह यम कहलाते हैं और शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान नियम कहलाते हैं। स्वाध्याय का अर्थ है नित्य सद्ज्ञान के ग्रन्थ वेद एवं वेदानुकूल साहित्य का अध्ययन, चिन्तन, मनन, उसके अनुसार प्रैक्टिकल व संगतिकरण करना और साथ ही उन विषयों का अज्ञानी, अल्पशिक्षितों में प्रवचन व प्रचार करना है। ऐसा करके ही वैदिक धर्म व संस्कृति को सुरक्षित रखा जा सकता है और हम भी इससे होने वाले लाभों को प्राप्त कर सकते हैं। महाभारत काल के बाद महर्षि दयानन्द जैसा ज्ञानी मनुष्य उत्पन्न नहीं हुआ। इस मान्यता की सत्यता की पुष्टि केवल शास्त्रीय ज्ञान से युक्त निष्पक्ष व निःस्वार्थ स्वभाव के मनुष्य ही कर सकते हैं। हम इस बात की अपने ज्ञान व विवेक से पुष्टि करते हैं और आर्यजगत के सभी वैदिक विद्वान भी अनेक प्रमाणों व युक्तियों से इस मान्यता को सत्य सिद्ध कर सकते हैं। ऋषि दयानन्द में ज्ञान की जो पराकाष्ठा थी व उन्होंने जो ऋषित्व प्राप्त किया उसका कारण वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का ज्ञान था। ऋषि दयानन्द आदर्श ईश्वर भक्त, ईश्वरोपासक, वेदों के ज्ञानी व भाष्यकार, अनेक वैदिक अपूर्व ग्रन्थों सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदभाष्य, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि के लेखक हैं। उनका यह साहित्य केवल वैदिक धर्मियों के लिए ही नहीं है अपितु मनुष्य मात्र के लिए है। उनसे पूर्व समस्त धार्मिक शास्त्रीय साहित्य संस्कृत भाषा में था। महाभारत काल तक भारत व विश्व की भाषा भी संस्कृत ही थी। अतः स्वभाविक रूप से उस काल में प्रचलित संस्कृत भाषा में ही समस्त साहित्य रचा गया।

ऋषि दयानन्द ने एक क्रान्तिकारी कार्य यह किया कि देश, काल और परिस्थिति को देखते हुए ज्ञानी, अज्ञानी तथा साधारण बुद्धि वाले मनुष्यों की स्थिति का अनुमान कर अपना समस्त साहित्य हिन्दी भाषा में रचा। ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका व वेदभाष्य को संस्कृत व हिन्दी दोनों भाषाओँ में रचा है। ऋषि की सबसे बड़ी एक देन यह भी है कि संस्कृत से अनभिज्ञ साधारण हिन्दी जानने वाला मनुष्य भी वेद की गूढ़ व गूढ़तम बातों को हिन्दी में पढ़कर जान सकता है। यही कारण है कि ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों के प्रचार से देश भर में हिन्दी भाषा का प्रचार हुआ और देश के पूर्व, पश्चिम, उत्तर व दक्षिण राज्यों सहित विश्व के अनेक देशों में, जहां भारतीय निवास करते हैं, वहां ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों को हिन्दी के माध्यम से पढ़कर लोग वेद और वैदिक साहित्य का अच्छा ज्ञान रखते हैं। किसी भी मत का कोई आचार्य व अनुयायी देश विदेश में रहने वाले हमारे आर्य बन्धुओं को वेदों से विमुख नहीं कर सकता अपितु स्वाध्यायशील आर्य बन्धु दूसरे मतों के बड़े बड़े आचार्यों व अनुयायियों को उनके मत की कमियों से परिचित कराकर उन्हें वैदिक धर्म की शरण में लाने की योग्यता रखते हैं। वैदिक मत के सिद्धान्त सार्वजनीन हैं जो सभी मनुष्यों को इस धर्म को अपनाकर अपना वर्तमान जीवन और परजन्म सुधारने की गारण्टी भी देते हैं।

स्वाध्याय से मनुष्य के निज जीवन का कल्याण तो होता ही है इसके साथ धर्म की रक्षा भी होती है। देश व समाज मजबूत होता है। अज्ञानता व अन्धविश्वास दूर होते हैं। लोग बुरी परम्पराओं को छोड़कर बुद्धियुक्त बातों व परम्पराओं को ही स्वीकार करते हैं। स्वाध्याय से ईश्वर, जीव व प्रकृति के यथार्थ ज्ञान सहित मनुष्य को अपने सभी कर्तव्यों व अकर्तव्यों का ज्ञान भी होता है तथा उनसे होने वाले हानि व लाभ भी विदित होते हैं। जो मनुष्य ईश्वर व जीव आदि के विषय में जितना अधिक जानता है उससे विकसित क्षमता से वह इतर ज्ञान-विज्ञान को भी भली प्रकार जानकर उससे स्वयं लाभान्वित होने के साथ शिक्षा, प्रवचन व लेखन द्वारा दूसरों को भी लाभान्वित कर सकता है। स्वाध्याय का लाभ यह है कि घर बैठे ही ईश्वरोपासना व यज्ञ आदि का गहन ज्ञान प्राप्त कर उसका पालन व आचरण किया जा सकता है। स्वाध्याय से हम अपने भविष्य के खतरों को भी जान सकते हैं और उनसे रक्षा के उपाय कर सकते हैं। आज हिन्दुओं की जनसंख्या घट रही है और विधर्मियों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। स्वाध्यायशील व्यक्ति इसके दुष्प्रभावों को भली प्रकार से जानता है और उससे वह अपने समाज व सम्बन्धियों को भी आगाह करने के साथ उन खतरों को दूर करने के उपाय भी बता सकता है। ऐसे अनेक लाभ स्वाध्याय से होते हैं। स्वाध्याय के साथ सत्संग व संगतिकरण का भी अपना महत्व है। स्वाध्याय में बहुत से गहन विषय समझ में नहीं आ पाते। उन्हें विद्वानों के प्रवचन, उनसे वार्तालाप व चर्चा करके आसानी से समझ सकते हैं। विद्यालयों व गुरुकुलों में विद्यार्थी अपने आचार्यों से जो ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे वह अपने अध्ययन व स्वाध्याय सहित विषय की पुनरावृत्ति करके ही स्थिर व स्मरण कर पाते हैं। हमने अपनी मित्रमण्डली में देखा है कि बड़ी उम्र के एक अपढ़ व्यक्ति आर्यसमाज के प्रभाव से अपने बच्चों से हिन्दी के अक्षरों को जानकर धीरे धीरे पत्र-पत्रिकायें पढ़ने लगते हैं और कुछ महीनों बाद वह पत्रिकाओं के लेख पढ़कर सम्पादक को पत्र भी लिखते हैं जो अनेक बार प्रकाशित हुआ करते थे। यह सब स्वाध्याय व पुरुषार्थ से सिद्ध होते हैं।

श्रावण का महीना श्रवण व स्वाध्याय से सम्बन्ध रखता है। वर्षा ऋतु के कारण ग्रामीण व नगरों के मनुष्यों को श्रावण व उसके बाद के कुछ महीनों में कुछ कार्यों से अवकाश मिल जाता है। उस बचे हुए समय को स्वाध्याय में लगाकर कई विषयों का अध्ययन किया जा सकता है। यदि सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि, ऋषि जीवनचरित सहित वेदभाष्य, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण, महाभारत आदि को पढ़ा जाये तो मनुष्य वैदिक विद्वान बन सकता है। योगदर्शन के साधनापाद के 44 वें सूत्र में स्वाध्याय से होने वाले लाभ को बताया गया है। सूत्र है स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः।’ प्रसिद्ध दार्शनिक विद्वान पं. उदयवीर शास्त्री इस सूत्र का भाष्य करते हुए कहते हैं कि स्वाध्याय से अभिलषित देवता वा दिव्य आत्माओं का सम्प्रयोग अर्थात् उनसे सम्बन्ध, मेल वा साक्षात्कार होता है। इस सूत्रार्थ की व्याख्या करते हुए वह लिखते हैं श्रद्धापूर्वक स्वाध्याय के अनुष्ठान से अनेक बार स्वाध्यायी के मस्तिष्क में आकस्मिकरूप से अभिलषित अर्थ प्रतिभात हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे कोई दिव्य आत्मा आकर इस अर्थ को बता गया है। ऐसे स्वायायशील योगी के मस्तिष्क अथवा भावनाओं में देव, ऋषि एवं सिद्ध आत्मा दर्शन देते जाने जाते हैं। योगी इनसे अचानक सन्मार्ग एवं सम्प्रवृत्तियों की दिशा को जानने समझने में सफल होता है। इसी स्थिति को सूत्र के उक्त पदों से अभिव्यक्त किया गया है।’ लेखक के भाष्य वा व्याख्या से हमारे कुछ विद्वान सहमत नहीं होंगे। पं. उदयवीर शास्त्री जैसे प्रसिद्ध गम्भीर विद्वान यदि ऐसी बाते लिखते हैं तो उसमें पूर्ण व कुछ तथ्य तो होगा ही। स्वाध्याय से मनुष्य को अनेक लाभ होते हैं। ईश्वर स्वाध्याय करने वाले को स्वाध्याय का लाभ देते हैं। गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने कहीं लिखा है कि उन्होंने सत्यार्थप्रकाश को सम्भवतः 18 बार पढ़ा और उन्हें सत्यार्थप्रकाश में लिखी अनेक बातों के नये अर्थों व रहस्यों का बोध हुआ। स्वाध्याय से हमारा वर्तमान जीवन व परजन्म सुधरता है। अनेक अन्य लाभ भी होते हैं। अतः स्वाध्याय में प्रमाद नहीं करना चाहिये। ओ३म् शम्।

मनमोहन कुमार आर्य