डिफॉल्ट

दोहा मुक्तक

कभी आप मत कीजिए, जानबूझकर पाप।नाहक  लेने  से  भला,       दूर  रहे  संताप।समझदार हो खुद बड़े, फिर भी देता सीख-अच्छा होगा आप हित, करो नाम प्रभु जाप।।दसकंधर ने था किया, हर  सीता  को  पाप।चढ़ा लिया निज शीश पर, बस दंभी संताप। पाया  अपने  कर्म  का, इक  दिन  ऐसा दंड-जिसे आज दुनिया कहे, नारी का अभिशाप।।आज मनुज के शीश पर, नृत्य करे संताप। धैर्य भला अब है किसे, बस हो जाता पाप।रहते  इतने  चूर  हैं,      जैसे  वो  ही  श्रेष्ठ –   जाने क्यों इंसान का, उच्च शिखर पर ताप।।भय का भार हटाइए, रखिए उत्तम भाव।              उल्टी पुल्टी सोच से, मन  में होता  घाव।भय देता है आपको, सदा दुखद आधार-                     आप निशाचर मानकर, मानो मेरा सुझाव।।सारी दुनिया इन दिनों, रही  युद्ध से  काँप।      भय का जो प्रभाव है, उसका क्या है नाप।                    जैसे-तैसे कट रहे,   हम सबके दिन आज-                     इसके कारण नित्य का,  रहे अधूरा जाप।।भीड़  तंत्र  की  ओट  में, सीमा  लाँघें  लोग।आज  देश  में  देखिए,  फैल  रहा  ये  रोग।संविधान  के  संग  में, भूल  रहे  निज  कर्म-अपराधी भी आजकल, लगा रहे अभियोग।। ये  वसुधैव  कुटुंबकम्,      देता  नेक  विचार।मिल-जुलकर रहिए सभी,   भाई-चारा   सार।जिसको दुनिया कर रही, हर्ष सहित स्वीकार-प्राणी  सब  संसार  के, मिला-जुला परिवार।।मिलकर सभी जगाइए, जग में सुखदा भाव।नहीं किसी को दीजिए,  छोटा सा  भी  घाव।दे  वसुधैव  कुटुंबकम्,   शुभता  का  संदेश -देना  है  तो  दीजिए,     कोई  नया  सुझाव।।साहस  से  ही  सभी  के,     पूरे  होंगे  काम।भय को दोषी  मानकर, करो  नहीं  बदनाम।सोच समझकर कीजिए, निर्णय  सारे  आप-छिपकर ओट में मित्रवर, मत टकराओ जाम।।भय का अपना है अलग, नीति -नियम सिद्धांत।उसको  खुद  पर  गर्व  है,    वही   बड़ा  वेदांत।चक्रव्यूह  में  जिसे  भी,    भय  लेता  है  फाँस-वही सुनाता सभी को, असफल अपना वृतांत।।जो डर-डर कर जी रहे, करते निज गुणगान।अपनी क्षमता का उसे, होता कहाँ  है  भान।लीला  भय  की  गा  रहे,   कहते  मेरा  यार-कोचिंग में अब छात्र भी, बाँट  रहे  हैं  ज्ञान।।मौसम  भी  दिखला  रहा, तरह-तरह  के  रंग।प्राणी  जन  बेचैन  हैं,           होते  रहते  दंग।पर दोषी हम आप हैं,     मौसम का क्या दोष-जल जंगल संग धरा को, करते निशदिन तंग।।अंतर्मन के  द्वंद्व का,  समझ  रहा  हूँ  राज।यह तो मेरे मूल का,   बस थोड़ा सा ब्याज।चिंता  इतनी  मात्र  है,    बांटूँ  किससे  दर्द-सब अपने ही स्वार्थ में, दिखें सजाए ताज।।आज त्याग की बात भी,    सपनों जैसी रात।क्योंकि इसकी आड़ में,   होते नित प्रतिघात।अब तो ये  बकवास है, शेष  महज  अपवाद -त्याग दूर की भावना, रखिए भीतर जज़्बात।।हिंसा  और  चुनाव  तो,  दोनों मिलकर साथ।जब  चुनाव  का  समय हो, थामें  दूजा  हाथ।सरकारें  भी  क्या  करें,    रहती  हैं  हलकान-हर  चुनाव  में  ही  सदा, जनता  पीटे  माथ।।देख रहा हूँ आजकल, धोखा देते लोग।जिनको अपना कह रहे, वही बने हैं रोग।व्यर्थ आप हम मानते, करें खूब विश्वास -कहें मित्र यमराज जी, मत मानो संयोग।।करते रहिए चिंतन मनन, नित्य नियम से आप।पीछे  अपने  कर्म  से,        शीश  चढ़ाया  पाप।अपराधी  भी  स्वयं  को,  मान  कीजिए  न्याय-नहीं किसी का दिल दुखे, दूर  रहे  अभिशाप।।चिंता   चिंतन संग  में,     रहना  चाहें  साथ।दोनों  ही  हैं  चाहते,        थामे  रहना  हाथ।जिम्मेदारी   आपकी,      दूर   रहे  टकराव -नाहक ही क्यों पीटना, कल में अपना माथ।।अंतर्मन में क्यों  भला,   भीतर  इतना  घाव।जिससे  इतना  हो  रहा, रहता  नित्य  स्राव।मित्र  बात   यमराज  की, रखिए थोड़ा मान-रखिए  अंतर्मन  सदा,      मानवता  सद्भाव।।अंतर्मन से वो सदा, रहती  शीश  सवार।सबसे ज्यादा करे भी, हमको प्यार दुलार।छोटी है तो क्या हुआ, लड़ती भी है खूब -मात-पिता के बाद से, वही आज आधार।।अपनी  खिचड़ी  पक  गई, आओ  खाएँ  यार।फिर मिलकर हम भी करें, आपस में तकरार।।समय-समय की बात है, कहें  मित्र  यमराज -किस्मत भले ही सो रही, चलना है उस पार।।सब कुछ लिखा किताब में, जीवन का हर सार।अगर  पुस्तकें  पढ़  लिया,    सारी  बाधा  पार।।हर  मानव  को  चाहिए,    पढ़े  पुस्तकें  नित्य -इतने  भर  से  मान  लो,   देंगी  जन  को  तार।।मानव  अपने  कर्म  से,         खींचे  नई  लकीर।भाग्य  भरोसे  जो  रहे,       रहता  सदा  फकीर।स्वयं  विधाता आप हो,     उठो  चलो  रख  धैर्य -खुद पर यदि विश्वास हो, लिख दो जगत नजीर।।मानव का  कृतित्व, रही  मिट जैसे धरती।क्या होगा अस्तित्व, ताल पोखरा जलती।।कहें मित्र यमराज, बचाना जंग का जीवन-करो सभी मिल आज, वृक्ष जीवन में भर्ती।भले  मिटे  संसार, नहीं सुधरेगा मानव।जैसे  अत्याचार,  बना  है इंसाँ  दानव।।दें मानव को शाप, त्रस्त हैं सारी दुनिया-धरती है बैचैन,  देखकर रोती मुनिया।।अब कितना अपनत्व है, देख रहे हम आप।अपनेपन की आड़ में, बढ़ता  जाता  पाप।।कहें मित्र यमराज जी, ऐसा  क्यों  है आज-हर प्राणी के हृदय जो,  इतना  है  संताप।।मुक्तक सरसी छंद 
अब  जीवन  की हर  मुश्किल से, मैं ही  तुझे  बचाऊँगा।तुझे  छोड़कर  मेरी  बहना,    कभी  न मैं  जा  पाऊँगा।।मेरा  परिचय  सिर्फ  एक है,      केवल  तेरा  नाम  लिखूँ-अब तो लक्ष्य एक है केवल, इतिहास नया बन जाऊँगा।।

*सुधीर श्रीवास्तव

शिवनगर, इमिलिया गुरूदयाल, बड़गाँव, गोण्डा, उ.प्र.,271002 व्हाट्सएप मो.-8115285921

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