ग़ज़ल
तुझे देखने को तलबगार आए।
लिये आरज़ू हम तेरे द्वार आए।
मुहब्बत तुम्हीं से हुई है बता दूॅं
लिये जान हथेली हम यार आए।
करोगी हमीं से कभी तो मुहब्बत,
पहन के तभी से गले हार आए।
बिना प्यार के ज़िंदगी भी नहीं है,
कसम है खुदा की खुदी मार आए।
सदा याद रखना वफ़ा यह हमारी,
बमुश्किल बचा के कहीं प्यार आए।
लुटा दी जवानी यही सोच के ही,
कहीं फिर न कहना गुनहगार आए।
हमीं पे जमाना जफा कर रहा था,
बचा के नजर हम बफ़ादार आए।
— शिव सन्याल
