सामाजिक

अब स्त्री विमर्श बंद हो

आज इक्कीसवीं सदी में भी कुछ स्त्रियों के प्रति कुछ मर्दों का नज़रिया अट्ठारहवीं सदी वाला ही होता है उनकी नज़रों में स्त्री कम अक्कल, हीनबुद्धी और भोगने की वस्तु मात्र है। क्यूँ आज भी लेखकों की कलम बार-बार स्त्री विमर्श में लिखने को मजबूर होती है। आज भी स्त्रियों के लिए पन्ने भर-भरकर लिखा जाता है। अबला, लाचार, बेचारी जैसे उपनाम से नवाज़ी जाती है। इसका मतलब कहीं ना कहीं कुछ स्त्रियों के साथ अन्याय हो रहा है।
स्त्रियों को निम्न समझने वालों को कुछ बातें समझनी चाहिए स्त्री संसार की धुरी है, चार दिन भी स्त्री के बिना गुज़ारा नहीं कर पाओगे। स्त्री सम्माननीय है।
कुछ बातों को समझने की जरूरत है। अगर स्त्री पुरुष के पीछे रहती है तो इसका मतलब ये हरगिज़ नहीं की वो कमज़ोर है। स्त्री अपने पति का सम्मान करती है, अपने पति को आगे रखकर ये जताना चाहती है की आप हमारी ज़िंदगी के रथ के सारथी हो, आपकी छत्रछाया में हम महफ़ूज़ है, आपके नक्शेकदम पर चलकर मैं मंज़िल को पाना चाहती हूँ।
और अगर स्त्री पुरुष के आगे रहती है तो वो गर्वित या अहंकारी नहीं, नांहि वह स्त्री खुद को पुरुष से शक्तिशाली हूँ ऐसा स्थापित करना चाहती है। ऐसी स्त्री सिर्फ़ ये जताना चाहती है की आप पर आने वाली हर विपदा को पहले मुझसे टकराना होगा, मैं ढ़ाल हूँ। ज़िंदगी के संघर्ष  में आप पर उठने वाली बिहड़ लहरों को पहले मैं झेलूँगी, आप पर उठने वाली ऊँगली को मरोड़ दूँगी।
और अगर स्त्री पुरुष के साथ चलती है तो कुछ पाने की चाह में नहीं बल्कि पुरुष के उठाए हर कदम हर निर्णय में उसका साथ देना चाहती है। कंधे से कंधा मिलाकर ज़िंदगी की हर लड़ाई में साथ देना चाहती है, स्त्री को ईश्वर ने सक्षम बनाया है वह घर और बाहर दोनों ज़िम्मेदारीयाँ बखूबी निभाने में माहिर होती है।
आज की नारी कहाँ से कहाँ पहुँच गई है हर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाकर खुद को स्थापित किया है। पर देखा जाता है की मर्दों को ऐसी बुद्धिमान और  सक्षम औरतें पसंद तो बहुत है पर अपनी नहीं किसी ओर की, अपनी को हंमेशा खुद से एक पायदान नीचे ही देखना पसंद करते है। क्यूँ आख़िर कब तक कुछ औरतें ऐसे नज़र अंदाज़ होती रहेगी ? शृंगार रस में औरतों की जी भरकर तारिफ़ें होती रहती है, कामुकता की क्यारी मात्र नहीं। स्त्री जरूरत है परिवार की, स्त्री जरूरत है संसार की अब तो बराबरी का दर्ज़ा दे दो कब तक पैरों की जूती समझकर मसलते रहोगे।
ज़िंदगी का अलाव कुछ स्त्रियों के लिए  लिए कुछ ज़्यादा ही शीत है, अपने हिस्से की धूप की तलाश में सदियों से दो गोत्र में बंधी भटक रही है। वो ढूँढ रही है एक ऐसा पुरूष जो उसे स्त्री होने का अर्थ प्रदान करें, जो उसके अस्तित्व को आसमान दें। उसका हाथ पकड़ कर उम्र के सफ़र में हर राह पर फूलदल सी परत बिछाए। वो तरस रही है नम आँखों से अपनी पहचान ढूँढती कोई थामें हाथ और घर की दहलीज़ पर छोटे से अक्षरों में उसका नाम भी गुदवा कर हल्की सी पहचान दे। ज़िंदगी की आपाधापी में उलझते जो खुद के प्रति लापरवाह होते खो गई है उसे याद दिलाए की वो सिर्फ़ पत्नी, बहू और माँ ही नहीं एक इंसान भी है। कुछ बातें याद दिलाए जो बालों में उग आई चाँदी के भीतर दब गई है
तन से परे उसके मन की भूगोल को समझे। भावनाओं की कसमसाती नदी को खेलदिल दरिया बनकर अपने भीतर थाम ले। वो ढूँढ रही है एक ऐसा पुरूष जो लक्ष्मी, दुर्गा और सीता सा सम्मान दें। धुंधले पड़े उम्र के आईने से संघर्षो की लिपि धूल को पोंछकर उसके वजूद का प्रतिबिंब दिखाए।
सदियों से कुछ नारी पन्नों पर विमर्श की परछाई बन उभर रही है। एक पन्ना आज़ादी के कोरे आसमान सा ढूँढ रही हैं। कब आएगा वो दिन जब साहित्य के संसार से स्त्री विमर्श का अध्याय समाप्त कर दिया जाएगा और “स्त्री मर्द का पर्याय” विषय को सम्मिलित कर लिया जाएगा।
— भावना ठाकर

*भावना ठाकर

बेंगलोर