कविता

कैसी है मेरी मज़बूरी

हम अपनों से दूर हुए
   कैसी है मेरी मज़बूरी ?
जिस माँ ने जनम दिया
     वह माँ आज है अकेली |
उसके प्यार के लिए
 हम भाई
आपस में लड़ जाते थे ,
हम दोनों को झगड़ते देख
  मांँ कहती –
तुम  दोनों मेरे राम लखन हो
संस्कार दिया है हमने
    श्रवण कुमार बनकर
 माता  –  पिता की सेवा करना ,
हम अपनों से दूर हुए
  कैसी है मेरी मज़बूरी ?
पिता देखें मेरे आने की राह
   कोई पूछे मेरे बारे में,
हंँसकर कह देते –
   परिवार में है ख़ुशहाल
मुझे अब क्या चाहिए ?
    मेरे बच्चे सब खुश रहें
हमसे दूर होकर भी देते हैं दुआ
हम अपनों से दूर हुए
   कैसी है मेरी मज़बूरी ?
कहांँ गई मेरे घर की रौनक़ ?
   चंद रुपयों के लिए
 मैं सिमट कर रह गया
हम अपनों से दूर हुए
   कैसी है मेरी मज़बूरी ?
थका  हुआ – सा  जब घर आता
मंदिर में भगवान को न पाता हूँ
उदास मैं हो जाता
काश ! मुझे भी ! कोई समझ लेता
   मैं क्या चाहता हूंँ ?
छोड़ के मैं न आता  ,साथ उन्हें भी लाता
हम अपनों से दूर हुए
   कैसी है मेरी मज़बूरी ?
सोचता हूँ कभी – कभी
  पति , पिता  , दामाद
बनकर मै रह गया ,
सबसे से नाता तोड़
    कैसा रिश्ता जोड़ लिया ?
सबके रहते हुए भी ,
      मैं अकेला रह गया
हम अपनों से दूर हुए
  कैसी है मेरी मज़बूरी
— चेतना प्रकाश चितेरी

चेतना सिंह 'चितेरी'

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