माँ की यादें
कितना मासुम था अपना वो नजारा
जब माँ का मैं बेटा था बड़ा ही दुलारा
गोद में अपने बिठाकर ममता थी लुटाती
शीतलता की छाया ऑचल में थी सुलाती
जब कटोरे में दूध रोटी लेकर आती थी
अनुनय विनय कर पास हमें बुलाती थी
धूल धूसरित तन ले माँ की गोद में आता
माँ की ममता पाकर वात्सल्य में खो जाता
रात चन्दा जब गगन पे आ मुस्कुराती
लोरी गा गा कर हमें थी वो सुलाती
कभी कहानी सुनने की जिद्द मैं करता
राजा रानी की ख्वाबों को कह सुनाती
काश ! आज भी मेरे निकट ही होती अम्मा
भूल जाता मैं दिन रात की नफरत की गुम्मां
सामने बिठाकर काश ! हमें तुम निहारती
तुम्हें देख मैं खुश हो ये कष्ट मेरी भूला देती
कहाँ चली गई तुँ गगन में मेरी प्यारी अम्मा
कहाँ पे बना ली है अपनी नई घर तुम माँ
अकेला हमें छोड़ कर क्यूं तुम भाग गई हो
किसके भरोसे छोड़ जग से हार गई। हो
हमें भी ले चल तुम अपनी दुनियाँ में माँ
नहीं जीना है इस बेरहम जालिम जग में माँ
मैं अकेला अब ना लड़ पाऊँगा जग से
ले चल अपनी ऑचल की पालकी पे सजा के
— उदय किशोर साह
