ग़ज़ल – नहीं सिर तुम झुकाते हो
खुदा के दर कभी जा के नहीं सिर तुम झुकाते हो।
बड़े खुदगर्ज बंदे हो, जरूरत पर बुलाते हो।
रहे सादा सदा बन के, तिलक माथे लगा कर के,
नहीं यह कर्म शुभ तेरे, यतीमों को सताते हो।
नहीं महजब सिखाता है, करो नफरत यहाॅं बंदे
दुखा के दिल गरीबों का, बड़े दिल पाक जाते हो।
सजा के देख टूटे दिल, मुहब्बत के सितारों से,
मियां मिट्ठू बड़े बनते, जिगर सब का रुलाते हो।
भले चमड़ी चली जाए, न दमड़ी हाथ से छूटे,
लगाके भोग मालिक को, खुशामद कर खिलाते हो।
बड़े ढोंगी छुपे रुस्तम, बड़े उस्ताद भोले हो,
जहाॅं मतलब लगे तो हाथ,अपना जा मिलाते हो।
— शिव सन्याल
