हौसलों से उम्मीद
अंधेरों से क्यों डरना है, जब भीतर दीप जला है,
रास्ते चाहे कठिन हों, हौसलों से उन्हें सजाना है।
ये ठोकरें ही सिखाती हैं, कैसे आगे बढ़ जाना है,
गिरकर फिर उठ जाना, ये जीवन का ‘तराना’ है।
सपनों को मत सोने दो, उन्हें हकीकत बनाना है,
आज नहीं तो कल ही, ‘मंजिल’ तक तो जाना है।
हवा तेज़ हो या आँधी, दीपक फिर भी जलता है,
जो खुद पर विश्वास रखे, वही सदा ‘संभलता’ है।
उम्मीद की ये छोटी लौ, अंधेरा सब ‘हर’ जाती है,
जो कभी हार नहीं माने, वो जीत वरण करता है।
उजालों की ओर जो देखें, वहीं तो ‘टिक’ पाता है,
ख्वाब और ख्वाहिशे बड़ी, वही प्रेम गीत गाता है।
— संजय एम तराणेकर
