भंवर में कश्ती यहां कौन करता है
मुहब्बत की नमाजों में इमामत कौन करता है,
ईश्क़ ईबादत है,सच्ची ईबादत कौन करता है,
पल हर पल तेरी हसरत है,दिल मानता नहीं,
दिल से मजबूर हैं,हम बग़ावत कौन करता है,
बात अब तो ये आ पहुंची है,तर्क़ तॉल्लुक़ तक,
दिल दे दिया हमने,एसी ख़यानत कौन करता है,
तुम्हारे सब खु़तुत रख्खे हैं मैंने हिफ़ाज़त से,
अरमानों को दिलसे लगाकर कौन रखता है,
हमसे न टकराएं समन्दर मौजों से कह देना,
बिना सोचे भंवर में कश्ती यहां कौन करता है,
ये उदासी,ज़ुबां ख़ामौश आंखें हो गईं पत्थर,
इंतज़ारे इंतेहा एतबार एसा भी कौन करता है,
ग़ज़ल मेरी तेरे तस्व्वुर से हुआ करती है,रौशन,
तेरी रज़ा है तो फ़िर दुनिया से कौन डरता है,
वो आकरके शर्म से बाज़ु में कुछ इस तरह सिमटे,
उसको बाहें मेरी छोड़ें,एसी हिमाकत कौन करता है,
तब्स्सुम ने लबों की थरथराहट ने मुश्ताक़ बैचैन कर दिया,
दिल दे दिया तुमको बताओ एसी तिजारत कौन करता है,
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
