लघुकथा

मदर्स डे 

आज विभा सुबह से ही बड़ी उदास थी।उसे मालूम था कि आज मदर्स डे है और उसका बेटा आज उसके साथ नहीं  है,दस महीने हो गये उसकी नौकरी लग गयी।अब वह भारतीय सेना में शामिल हो चुका है।हर साल वह धूमधाम से अपनी मां के साथ मदर्स डे बनाता था।खैर,, विभा ने उसे फोन लगाने की कोशिश की पर फोन ने न लगकर विभा की उदासी और भी बढ़ा दी। 

             थोड़ी देर में बहू भी मैं आती हूं मां जी कहकर न जाने कहां चली गयी।सारे घर पर सूनापन पसर गया।करीब हैं घंटे बाद बहू थैलों से लदी घर आयी।और सीधे अपने कमरे में घुस गयी।शाम को वह फिर तैयार होकर विभा से बोली मां जी आप भी तैयार हो जाईए।विभा ने तुनककर कहा तुम्हें जहां जाना है जाओ ना ,किसने मना किया है , मैं तैयार होकर क्या करुंगी। बहू ने मुस्कुराया और मोबाईल पर गाना बजा दिया ,”तू कितनी अच्छी है मां,ओ मां , मां ओ मां।गाना बजते ही और भी महिलाएं  कमरे में आ गयी और विभा के पैर छूने लगी और हेप्पी मदर्स डे मां कहने लगी।

         विभा आश्चर्यचकित सभी को देखने लगी। बहू ने कहा मां, आपका आशीर्वाद हम सब पर बना रहे,ये मेरी सहेलियां हैं,इन सबकी मां, सासु मां दूसरी जगह पर रहती हैं तो हमने प्रोग्राम बनाया कि इस तरह हम मदर्स डे मनायें।आईए केक काटिए।विभा की आंखें भर आयीं,उसने कहा तुम सब भी तो मां हो हम सब मिलकर केक काटेंगे। विभा को उपहार दिये गये ।सारा माहौल खुशनुमा हो गया।तभी फोन बजा उठा विभा के बेटे नवीन का फोन था।नवीन ने मां को बधाई दी तो विभा ने कहा बेटा ,भारत माता को भी मदर्स डे की बधाई तू भारत मां की सेवा कर।वह बहू की स्नेह दृष्टि से देखने लगी।

— अमृता राजेन्द्र प्रसाद

अमृता जोशी

जगदलपुर. छत्तीसगढ़