डब्बू
कहने को तो डब्बू जानवर था। पालतू नहीं था डब्बू। गली का कुत्ता था। लेकिन गली के और कुत्तों की तरह आवारा और लावारिश नहीं था। डब्बू अन्य कुत्तों की तरह भिखारियों व आने-जाने वालों पर बिना बात के कभी नहीं भौंकता, लेकिन किसी अनजान व्यक्ति पर शक हो जाने पर भौंक-भौंक कर सभी को सचेत रखता। डब्बू विजय के घर के पास गली में रहता, डब्बू को डब्बू नाम भी विजय ने ही दिया था। विजय हमेशा से ही जानवरों से प्रेम, दयाभाव रखने वाला इंसान था। गाय और कुत्तों को रोटी डालने को वह बहुत ही पुण्य और सेवा का काम समझता था। डब्बू एक दिन बीमार पड़ गया था, तो विजय ने ही उसे खाना-पानी देकर ठीक किया था। विजय गली के अन्य लोगों की तरह नहीं था, जो कुत्तों को दुत्कार देकर भगा देता था। वह फैक्ट्री दफ्तर से निकलते समय डब्बू को प्यार से पुकारता और उसे रोटी देता। दिन-ब-दिन विजय का यह क्रम जारी रहा और एक समय ऐसा आया जब डब्बू और विजय एक दूसरे को अच्छी तरह से जानने -पहचानने लगे और दोनों के बीच मित्रवत संबंध कायम हो गये। अब विजय कभी डब्बू को किसी बात को लेकर झिड़क और दुत्कार भी देता तो भी वह विजय के साथ प्यार और दोस्ती ही बांटता था। विजय इस बात को जानता था कि जानवर भी इंसान की तरह ही प्रेम, प्यार और दया के भूखे होते हैं, विशेषकर कुत्ते। विजय इस बात से भी अच्छी तरह से वाकिफ था कि सिर्फ कुत्ता ही ऐसा जानवर है जो किसान के फसलों से भरे खेत में से भी बिना कुछ खाये पीये चुपचाप निकल जाता है। विजय ने यह भी सुन रखा था कि महाभारत में परिजनों ने युधिष्ठिर का साथ छोड़ दिया था लेकिन जीवन के आखिरी क्षणों तक उनके साथ एक कुत्ता था। इसलिए विजय का कुत्तों से विशेष लगाव था, विशेषकर डब्बू तो उसका खास साथी हो गया था। सच तो यह है कि डब्बू विजय का और विजय डब्बू का हिमायती था। विजय डब्बू को जब भी नहीं देखता, तो वह बेचैन हो उठता था। बहुत ही समझदार होने के साथ-साथ डब्बू बहुत ही वफादार भी था। कहने को तो डब्बू का कोई मालिक नहीं था, लेकिन विजय ने डब्बू को सदैव अपने परिवार का एक सदस्य माना था, शायद सदस्य से भी बढ़कर। एक अजीब सा, सुंदर- सा, खूब प्यारा रिश्ता था- विजय का डब्बू के साथ। डब्बू , विजय के लिए कभी भी आक्रामक नहीं था, और जब भी डब्बू फैक्ट्री में काम पर जाता और वापस लौटता तो डब्बू अपनी पूंछ हिलाकर उसके साथ अठखेलियां करता। फैक्ट्री मैनेजर था विजय। खूब पैसे वाला लेकिन जानवरों के प्रति असीम प्रेम रखने वाला और डब्बू तो शायद उसकी आंखों का तारा ही था। डब्बू , विजय के लिए ईमानदारी व वफादारी की वह छवि था, जो विजय के प्रति अपना सबकुछ सौंप देता था लेकिन कभी भी पीछे नहीं हटता था। एक हटकर रिश्ता था- डब्बू और विजय के बीच, लेकिन जब रिश्ते दूर होने लगें या रिश्ते बनाने वाले न रहें या उन पर कभी कोई आंच आ जाए तो दिल और आत्मा को बड़ी तकलीफ़ होती है।
शायद आदमी के लिए किसी जानवर के मरने का दुःख इतना बड़ा नहीं होता। दुःख छोटे-छोटे ही होते हैं, रोज़मर्रा के दुःख, टुकड़ों-टुकड़ों में बंटे दुःख। विजय की जिंदगी में अचानक दुःख का दिन आ धमकता था। दरअसल, आज डब्बू को शायद किसी ने खतरनाक जहर दे दिया था।किसी की हद से ज्यादा नफरत ने आज डब्बू की जान लेने की कोशिश की थी।जहर के कारण डब्बू बहुत बुरी तरह से तड़प रहा था। विजय उस दिन शाम को जैसे ही फैक्ट्री से काम करके वापस लौटा उसने देखा कि डब्बू उसके घर की दहलीज़ पर पड़ा अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था। विजय ने तुरंत डब्बू के सिर पर हाथ फेरा और कहा-‘ डब्बू मैं तुम्हें मरने नहीं दूंगा, तुम मुझे जीवन के बीच अधर में छोड़कर कैसे जा सकते हो, एक तुम ही तो जो जीवन की मझधार में मेरे असली साथी हो, हिम्मत रखो दोस्त, मैं हूं ना, मैं तुम्हें हास्पीटल ले जाऊंगा और अच्छे से अच्छे डाक्टर से तुम्हारा इलाज करवाऊंगा।’ इतना कहकर विजय ने गली में पास ही खड़े अपने मित्र धीरज की सहायता से डब्बू को अपनी गोद में उठाया और तुरंत अपनी गाड़ी से उसे शहर के पशु चिकित्सालय ले गया, लेकिन होनी को शायद उसकी मृत्यु आज मंजूर थी। डब्बू का बच पाना बहुत मुश्किल था। हास्पीटल में वेटेरनरी डाक्टर ने विजय से कहा-‘ मैंने डब्बू को कुछ इंजेक्शन, दवाएं और ड्रिप दे दीं हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि हम डब्बू को बचा पायेंगे। बहुत ही खतरनाक जहर दिया गया है डब्बू को।’ विजय ने डाक्टर से कहा-‘ नहीं डाक्टर साहब, ऐसा न कहिए। आप चाहें जो भी कीजिए, जो भी दवाएं आपको चाहिए आप बेफिक्र बताएं, जिस भी हास्पीटल में डब्बू को रेफर करना है कीजिए, जितना भी खर्च डब्बू के इलाज पर लगे, मैं वहन करने के लिए तैयार हूं, लेकिन जैसे-तैसे मेरे जिगरी यार को आप बचा लीजिए, मैं आपसे मिन्नतें करता हूं।’ डाक्टर ने विजय से कहा-‘ विजय सर, आप समझिए, भावनाओं में मत बहिए, अब बहुत देर हो चुकी है। जहर की मात्रा भी बहुत ज्यादा है और अब तो डब्बू के सारे शरीर में जहर फैल चुका है। सच तो यह है कि यह किसी भी हाल में नहीं बचेगा। मुझे बहुत खेद है।’ डाक्टर ने जैसे विजय के आगे अपने सारे हथियार डाल दिए थे। विजय डाक्टर की बातें सुनकर यकायक मायूस हो गया लेकिन फिर भी उसने उम्मीद की किरणों के बांहें डालकर पास खड़े डाक्टर को पुनः झिझौड़ा और गिड़गिड़ाते हुए उनके पैरों में गिर गया और कहा-‘ ऐसा न कहिए, डाक्टर साहब ! भगवान के लिए इसे कैसे भी बचा लीजिए।’ विजय के झिझौड़ने पर भगवान के नाम से डाक्टर को याद आया और वेटेरनरी डाक्टर ने विजय से कहा-‘ आप इसे लुधियाना ले जाइए, हमारे यहां ज्यादा सुविधाएं मौजूद नहीं हैं, वहां पशुओं/जानवरों का एक बहुत बड़ा हास्पीटल है, और जानवरों के प्रसिद्ध डॉ. अकरम ही इसका जीवन किसी प्रकार से बचा सकते हैं।’ विजय फूट-फूटकर रोने लगा था, इतना तो शायद विजय अपने किसी सगे-संबंधी की मृत्यु पर भी नहीं रोया था। इधर उसका मित्र धीरज देख रहा था, कि फफक उठा था आज विजय, और हिचकियों पर हिचकियां ले रहा था। उसके स्मार्ट गौरे चेहरे से आंसू पर आंसू ढुलक रहे थे, लेकिन वेटरनरी डाक्टर से डब्बू को लुधियाना ले जाने की बात ने उसके मन में उम्मीद की कुछ किरणें जगा दी थी। धीरज ने उसे खूब ढ़ाढस बंधाने की कोशिश की, लेकिन विजय की रूलाई नहीं रूकी, फिर भी न जाने क्यों उसके हृदय के एक कोने में उम्मीद का दीया लगातार जल रहा था। विजय को पूरी उम्मीद थी कि डॉ अकरम डब्बू को बचा लेंगे।
विजय ने न आव देखा और न ताव और तुरंत डब्बू को लेकर अपनी गाड़ी से लुधियाना पहुंच गया, वहां बड़े व प्रसिद्ध डाक्टर डॉ. अकरम को दिखाया। डाक्टर ने गहन जांच के बाद सबसे पहले डब्बू को उल्टी को प्रेरित करने वाला उपचार दिया और साथ ही सात दिन की दवाईयां, कुछ महंगे इंजेक्शन और ड्रिप डब्बू को दिए। डब्बू को गहन आब्जर्वेशन में रखा गया। डॉ अकरम ने विजय से इलाज के समय कहा था -‘मैंने दवाएं, इंजेक्शन, ड्रिप डब्बू को दे दिए हैं, आपका प्यार-स्नेह और ईश्वर की असीम कृपा इसे जीवन दे सकती है। दवाओं के साथ दुआओं की, स्नेह प्यार, सेवा तथा इससे लगातार बातचीत की जरूरत है, इसे सहलाने की जरूरत है।’उस दिन विजय डब्बू के इलाज के समय पूरी रात उसके पास बैठा रहा, खाना तो क्या विजय ने पानी तक नहीं पीया। विजय बार-बार ईश्वर से डब्बू की जिंदगी की फरियाद कर रहा था। उसने डब्बू को खूब सहलाया, उससे प्यार और स्नेह से बात की, उसके हौंसले को बुलंद बनाए रखने का प्रयास किया। कुछ समय बाद डब्बू को उल्टी आई । विजय ने तुरंत डॉ अकरम को इस बारे में बताया। बाद में डाक्टर ने डब्बू के जठरांत्र पथ में विभिन्न विषाक्त पदार्थों को बांधने और आगे अवशोषण को रोकने में मदद करने वाली लगातार कुछ खुराकें दीं। विजय यह सब देख रहा था और याद कर रहा था कि कैसे डब्बू विजय के खाना खिलाने पर ही खाना खाता था। वह उसका बेसब्री से इंतजार किया करता था। विजय की स्मृति पटल पर दौड़ आया कि रोजाना की तरह आज सुबह भी डब्बू स्टेशन तक उसे छोड़ने गया था, लेकिन शाम को साढ़े पांच बजे उसे लेने नहीं आया। पिछली गर्मियों में जब एक कोबरा सांप विजय के घर में घुसने का प्रयास कर रहा था, डब्बू ने उसे अपने पंजों से मार गिराया था। विजय याद करने लगा कि रामू काका के घर में तीन बरस पहले जब चोर घुसने का प्रयास कर रहे थे तो अपनी भौं-भौं से उसने रामू काका के साथ साथ सभी मोहल्ले वालों को जगा दिया था और चोर दुम दबाकर भाग गए थे और चोरी नहीं हो पाई थी। डब्बू की वाच डाग की भूमिका याद करके विजय की आंखें बार-बार डबडबा रही थीं। आज डब्बू अचेत-सी अवस्था में उसके सामने पड़ा था। विजय मन में विचार करने लगा कि हर शाम को जब वह खाना खाने के बाद शहर में बने पार्क में घूमने जाता था तो डब्बू विजय के घर के गेट के बाहर उसका बेसब्री से इंतजार करता। वह विजय से लिपट जाता। एक छोटे बच्चे की तरह उसके साथ खेलता, भौं-भौं करता,अपना स्नेह -प्यार जताता। यहां तक कि अपने दोनों पंजों से विजय की बांहों में आने का प्रयास करता। अखबार वाला कभी जल्दबाजी में अखबार को विजय के घर की बजाय बाहर गली में फेंक जाता तो डब्बू उसे उठाकर विजय के घर की दहलीज़ पर डाल देता था। जब विजय का बेटा मयंक स्कूल जाने लायक हुआ तो डब्बू रोज उसे स्कूल छोड़ने साथ जाता, सोमवार से शनिवार तक रोज मयंक के स्कूल पहुंचा था डब्बू। विजय की स्मृति पटल पर यह बात कौंधी कि उस दिन जब मयंक के निमोनिया हो गया था और जब मयंक हास्पीटल में भर्ती था, तो डब्बू मयंक के हास्पीटल से डिस्चार्ज होने तक पूरी रात हास्पीटल के बाहर बैठा रहा था और मयंक के डिस्चार्ज होने पर डब्बू उन सबके साथ घर आया था। यह सब याद करते हुए वह डब्बू को लगातार सहला रहा था। विजय, लुधियाना में हास्पीटल में डब्बू और अपने दोस्त धीरज के साथ बैठा-बैठा यह सबकुछ सोच ही रहा था कि कब सुबह हो गई उसे पता ही नहीं चला। डॉ अकरम व अस्पताल के अन्य कर्मी अभी ड्यूटी पर नहीं पहुंचे थे। इधर, सुबह के लगभग नौ सवा नौ बजे विजय ने देखा कि डाक्टर की दवाएं, उसकी दुआएं शायद काम कर रही थीं, और अब डब्बू धीरे -धीरे सामान्यतः स्थिति में आ रहा था। डॉ अकरम व अन्य कर्मी लगभग साढ़े नौ बजे चिकित्सालय में पहुंच चुके थे। विजय ने डॉ अकरम के अस्पताल पहुंचते ही तत्काल डब्बू की हालत अच्छी होने के बारे में बताया और उनसे डब्बू के बारे में कुछ सलाह मशविरा के बाद डब्बू को बड़े प्यार से कुछ खाना व पानी आदि दिया । डब्बू को एक और दिन हास्पीटल में ही डाक्टर अकरम के आब्जर्वेशन में रखा गया। अगले दिन डब्बू का स्वास्थ्य लगभग- लगभग ठीक हो गया था। विजय और धीरज ने डॉ अकरम को डब्बू की जान बचाने के लिए धन्यवाद दिया। डॉ अकरम ने ने विजय से कहा-‘ इतने खतरनाक जहर से बाहर निकल जाना वाकई एक करामात है। अपने पच्चीस साल के डाक्टरी कैरियर में मैंने इतने खतरनाक जहर से किसी जानवर को बचते नहीं देखा। विजय ! यह सब आपकी दुआओं और डब्बू के साथ असीम प्यार-स्नेह का ही असर है, जो डब्बू की जान बच गई। मैंने देखा कि तुमने डब्बू की हालत ठीक नहीं होने तक अपनी पलकें तक नहीं झपकी, न ही कुछ खाया-पीया। एक छोटे बच्चे की भांति तुमने डब्बू की देखभाल की। डब्बू के प्रति तुम्हारे प्यार और स्नेह को देखकर मैं वाकई अंचभित हूं। ईश्वर तुम दोनों के स्नेह को सदैव बनाए रखें, तुम दोनों के बीच सदैव मित्रता का यह अटूट रिश्ता और आपसी विश्वास बना रहे।’ डॉ अकरम ने विजय के कंधे पर हाथ रखते हुए उसकी पीठ थपथपाई और अपने चैंबर में चले गए। विजय अपने प्यारे डब्बू और अपने मित्र धीरज के साथ खुशी-खुशी वापस अपने घर की ओर लौट रहा था और अब उसकी आंखों में खुशियों के आंसू थे।
— सुनील कुमार महला
