गीतिका/ग़ज़ल

गज़ल

उन्हें भुलाने की कोशिश में उन्हीं की याद आयी
हर बात से निकलकर बस उन्हीं की बात आयी।

सोने की कोशिश की, मगर हम न सो पाए रात भर
इन कोशिशों में हर दफ़ा इक और नई रात आयी।

मुस्कुराने की कोशिश की, हमने मगर हर बार
पर आँखों में फिर आँसुओं की ही सौगात आयी।

भरोसा उन पर खुद से ज़्यादा है हमें, मगर
मौसम बदलने की खबर हवा अपने साथ लायी।

वो कहते हैं कि बेवफ़ाई वफ़ा से जीत जाती है
भला कोई क्या जाने कि किसने किससे है मात खायी।

सोचा था ‘शैलेश’ उन्हें हम भुला देंगे आसानी से
मगर अब जा के याद हमें अपनी ही औक़ात आयी।

— डॉ. शैलेश शुक्ला

डॉ. शैलेश शुक्ला

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