वक्त और दर्द
अक्सर पूछे जाते हैं,
खबरों को लेकर तरह-तरह की बातें,
किए जाते हैं।
कुछ सुकून देने की बातें करते हैं,
कुछ उलझनों से रूबरू कराते हैं।
आज़ इस बात का अहसास हुआ,
समझकर विश्वास हुआ,
नजदिकियां बढ़ाने में,
सबसे पहले अपने दिल को तसल्ली देनी चाहिए,
फिर एक सुखद अनुभव पाने की,
एक महफ़िल में,
कोशिश करनी चाहिए।
जब तक मैं इस बात को लेकर,
गुफ्तगू करता रहा,
नया इतिहास रचते हुए आगे बढता रहा।
मन को तसल्ली मिलता रहा,
आमतौर पर खरा उतरने में,
काफी वक्त लगता रहा।
वक्त और हालात ऐसी थी,
मुश्किल वक्त में ही,
सबकुछ हासिल करने की हिम्मत जुटाते हुए,
आगे बढ़ने में लगा रहा।
आज़ इत्मीनान हूं,
परन्तु तमाम हसरतें पूरी करने के बाद भी,
बहुत ही परेशान हूं।
हिफाजत ख़ुद को ख़ुद से करना चाहिए,
इसकी वजह से रूबरू होना चाहिए,
नन्हे सुमन को इस बात का इल्म कहां,
उम्र बढ़ेगी तो,
इसपर बहसबाजी होगी यहां।
— डॉ. अशोक, पटना
