लघुकथा

लघुकथा : नासूर

योगिता को अच्छी ससुराल मिली। हरीश के रूप में मन-माफिक नौकरीपेशा पति मिला। शादी के साल भर बाद माँ बन गयी। सब कुछ बढ़िया ही बढ़िया ! परिवार बड़ा और संयुक्त था। सबके साथ सब कुछ अच्छा हो; जरुरी तो नहीं। हरीश का चचेरा भाई था नरेश। पढ़ा-लिखा तो था; पर बेरोजगार। उसे सरकारी नौकरी की चाहत थी। बेचारा हाथ-पाँव मारता; पर सब व्यर्थ। उसकी बेकारी पर अक्सर योगिता फब्तियाँ कसती थी- ‘क्यों नरेश ! आजकल तुम्हारा इधर-उधर बहुत आना-जाना होता है।’

क्या बात है भाई ! नौकरी मिली ? नौकरी मिलेगी, तब छोकरी मिलेगी। लगे रहो नरेश भाई।’
नरेश योगिता को कभी मजाकिया लहजे में जवाब देता, तो कभी चुप रह जाता; पर बातें अंतस को लगती थी। हरीश को नरेश के प्रति योगिता का व्यवहार अच्छा नहीं लगता था। समझाया एक दिन उसने- ‘योगिता ! नरेश की बेकारी की तुम खिल्ली मत उड़ाया करो।’
‘क्यों..? बस मजाक ही तो करती हूँ।’ योगिता तपाक से बोली।
‘नरेश को बहुत दुःख लगता है तुम्हारा मजाक करना। मैं अच्छी तरह जानता हूँ।’ हरीश ने कहा।
‘तुम्हें कैसे पता ?’ योगिता बोली।
‘घायल की गति घायल जानता है। बेकारी शरीर के नासूर से अधिक पीड़ादायक होती है।’ एक लम्बी साँस खींचते हुए हरीश ने कहा।’

— टीकेश्वर सिन्हा ‘गब्दीवाला’

@टीकेश्वर सिन्हा "गब्दीवाला"

शिक्षक , शासकीय माध्यमिक शाला -- सुरडोंगर. जिला- बालोद (छ.ग.)491230 मोबाईल -- 9753269282.