कविता

घर की देहरी

मेरे बंद कमरे की,
छोटी सी खिड़की से,
देखूं मैं, बरसात, ठंड और चढ़ती दोपहरी,
इन बदलते मौसमों की
रंगत से सजाये मैंने भी सपने,
जिनकी राह है सुनहरी,
पर जब पाने को अपने ख्वाब,
सोचती हूं मैं,
तो बन जाते सब ही प्रहरी,
कोई तो बताएं, आखिर कैसे?
लांघू मैं घर की देहरी।
इस धरा पर कितने स्वर गुंजित होते हैं,
कितने राग अलापें जाते हैं,
पर जब मैं अपनी वेदना सुनाती हूं,
बाहर निकलने के लिए आवाज लगाती हूं,
तो क्यों हो जाती है,
सारी कायनात बहरी,
कोई तो बताएं, आखिर कैसे?
लांघू मैं घर की देहरी।
बहती हुई नदियों को देखो,
सब अपने वजूद के साथ बहती हैं,
चाहे हो गंगा, यमुना या कावेरी,
फिर मेरे वजूद को पहचान मिलने में,क्यों लग रही है देरी,
कोई तो बताएं, आखिर कैसे?
लांघू मैं घर की देहरी।

— अंकिता जैन अवनी

अंकिता जैन 'अवनी'

लेखिका/ कवयित्री अशोकनगर मप्र jainankita251993@gmail.com