कविता – मैं सिमटती गई
कभी घूंघट,कभी बुर्के के पीछे मैं छिपती गई,तुमने जिस मर्यादा में रखा उसमें मैं सिमटती गई। अपने प्रेम और त्याग
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Read Moreएपस्टीन फाइल रिलीज हुई और साथ ही बड़ी -बड़ी हस्तियां बेनकाब भी हुईं। जिन लोगों के नाम एपस्टीन फाइल में
Read Moreजो छूट गयाजो टूट गया,क्या वो बेशकीमती था?जिसके न होने पर भीजिंदगी चल रही है हमारी,जिसके रूठने के बावजूद भी
Read Moreजिसे वक्त रहते तुम्हारी कद्र न हुई,उसे वक्त रहते ही बता दो।अपनी अहमियत को खुद समझों,अपने लिए खुद रास्ते बना
Read Moreमन बहुत उदास है और आंखें आंसुओं को छिपाने में नाकाम हो रही हैं। मुझे समझ में नहीं आ रहा
Read Moreजिंदगी में हमेशा सबकुछ सही नहीं होता। परिस्थितियां,कब? कहां? कैसे? प्रतिकूल हो जाएं पता ही नहीं चलता। इसलिए ये बहुत
Read Moreमेरी उदास जिंदगी मेंतेरा आगमन,कितनी खुशियां,और कितनी उमंगे लाया था,याद है मुझे वो वक्त,जो हमने साथ बिताया था।मेरी इच्छाओं को,पंख
Read Moreमेरे बंद कमरे की,छोटी सी खिड़की से,देखूं मैं, बरसात, ठंड और चढ़ती दोपहरी,इन बदलते मौसमों कीरंगत से सजाये मैंने भी
Read Moreजैसे -जैसे हमारा जीवन बीतता जाता है, वैसे – वैसे नये-नये अनुभव हमारे सामने एक के बाद एक आकर खड़े
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