वो कीचड़ जो सोच पर जमा है
एपस्टीन फाइल रिलीज हुई और साथ ही बड़ी -बड़ी हस्तियां बेनकाब भी हुईं। जिन लोगों के नाम एपस्टीन फाइल में आए, वे कोई मामूली लोग नहीं हैं, प्रसिद्धि प्राप्त लोग हैं। जो वीडियो या फोटो सामने आए हैं वे दिल को दहला देने वाले हैं। एक सवाल अक्सर मन में कौंधता रहता था कि स्त्री को भोग की वस्तु समझने वाली मानसिकता का अंत क्यों नहीं होता?
हम आए दिन बलात्कार और उत्पीड़न की खबरें पढ़ते-सुनते रहते हैं। मन में एक ही इच्छा बार-बार जागती है कि क्या ऐसे कानून नहीं बनाए जा सकते, जो जघन्य अपराधों को 100 प्रतिशत रोक सकें? पर… पर शायद ऐसा होना बहुत मुश्किल है क्योंकि देश और दुनिया के शीश पर बैठे लोग जिनके हाथ में शक्ति और सामर्थ्य दोनों हैं वे कभी ऐसा होने ही नहीं देंगे।
उदाहरण के तौर पर अभी भारत के ही किसी राज्य की विधानसभा में एक नेता बलात्कार जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अशोभनीय बयान देते नज़र आए। ऐसा पहली बार नहीं हुआ,कई बार हमारे नेता जिन्हें हम खुद चुनकर सत्ता में इसलिए लाए हैं कि वे हमें सुरक्षा देंगे, हमारे अधिकारों की रक्षा करेंगे, वही भक्षक बन जाते हैं। जिन्हें हम नायक मानते आ रहे हैं वे ही नालायक साबित होते हैं। कुछ बलात्कार के मामलों में तो नेता ही बलात्कारी हैं। अब ऐसे बेहाल में हम बेहतर हालातों की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं? सोचिए।
सबसे पहले जरुरी है जो नायक बने,वो लायक हो। उस पर कोई अपराधिक मामला न हो और अगर भविष्य में वह अपराधी साबित होता है तो उसे उसके पद से भी हटाया जाए और सजा भी दिलवाई जाये। बिना राजनीति खेले। यही शर्त विश्व स्तर पर भी लागू होना चाहिए। अभी जो होली जैसे रंग-बिरंगे त्यौहार पर महिलाओं के साथ अभद्रता हो रही है, उसका अहम कारण भी लोगों की महिलाओं के प्रति दूषित मानसिकता ही है।
अंत में सार केवल इतना सा है कि अगर समाज और दुनिया का कीचड़ साफ करना है तो सबसे पहले वो कीचड़ साफ करना पड़ेगा जो दिमाग में है और जो सोच पर सदियों से जमा हुआ है।
— अंकिता जैन अवनी
