कविता

वो माने या न माने

वो न चाहे करना इकरार,
उन्हें करने दो इंकार,
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता,
नाम सुन उनका मन मस्तिष्क उखड़ता,
ये आम बात है,
कारण अज्ञात है,
एक बार कह दिया कि वो नहीं है मेरा बेटा,
मैंने कहा कोई बात नहीं
पर मैं मानता हूं उन्हें मां,
जरूरी तो नहीं हर मां के हो कई जां,
उनके बेटे ने भी कह दिया एक दिन
कि वो किस एंगल से है मेरा भाई,
मैंने कहा मैं तो मानता हूं उसे,
अब वो भले मुझे मानता रहे कसाई,
फिर तो बहनें भी कहां पीछे रहने वाले थे,
अपने दिलों से रिश्ते निकाल डाले थे,
इस बारे में ज्यादा नहीं सोचता मेरा जेहन,
वे माने न माने सब है तो मेरी बहन,
जितनी मेरी समझ है उतना जानता रहूंगा,
वे सब माने या न माने
पर उनको ताउम्र अपना मानता रहूंगा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554