गीत/नवगीत

एक वर्षा गीत

नभ को निहार कहती सुनारि सखि! लगातार बरसे बदरा।
पहले फुहार फिर धारदार फिर धुआँधार बरसे बदरा।।

वय के किशोर चितचोर छोर पर घटाटोप बरसे बदरा।।
हिय को हिलोर जिय को विभोर कर सराबोर बरसे बदरा।।

मुँहजोर घोर घनघोर शोर कर नशाखोर वर से बदरा।
तब पोर-पोर तक में किलोर भर उठी जोर बरसे बदरा।।

किलकार मार शिशु सा पसार कर कलाकार बरसे बदरा।
ललकार मार तलवार धार बन अदाकार बरसे बदरा।।
नभ को निहार कहती ——–।।

बम से भड़ाम गिरते धड़ाम करते प्रणाम बरसे बदरा।
लख ताम-झाम हँसते सकाम जब धरा-धाम बरसे बदरा।।

घनश्याम शाम मग में अनाम जिस घड़ी राम! बरसे बदरा।
सच खुले आम जग उठा काम ऐसे ललाम बरसे बदरा।।

फिर छोड़-छोड़ कर को मरोड़ तन को झँझोड़ बरसे बदरा।
अब जोड़-जोड़ दुखता करोड़ रस सा निचोड़ बरसे बदरा।।

पट को सुधार लट को सँवार तब धरा सार बरसे बदरा।
सरकार हारकर तार-तार कर गए छार बरसे बदरा।।
नभ को निहार कहती —— ।।

— गिरेन्द्रसिंह भदौरिया “प्राण”

गिरेन्द्र सिंह भदौरिया "प्राण"

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