मुक्तक/दोहा

मन का दर्पण

मन का दर्पण जब चमकेगा,महक जाएगा जीवन।
मन में पावनता महकेगी,दमक जाएगा जीवन।
मन को मंदिर जैसा मानो,जीवन बने सुहावन,
मन का पंछी जब चहकेगा,चहक जाएगा जीवन।।

मन का दर्पण सत्य बोलता,सच का साथ निभाना।
बात न्याय की जब भी होगी,सद् को तुम अपनाना।
मन का दर्पण स्वच्छ रहेगा,तब ही मंगल होगा,
मन की बस्ती में रौनक हो,ऐसा भाव सजाना।।

मन का दर्पण नग़मे गाये,ऐसा पल आ जाए।
प्रीति दिलों में जगे आज तो,नव कल-कल भा जाए।
यही कामना,भाव हृदय है,जग सुंदर हो जाए,
हो विवेक और नवल चेतना,अपनापन आ जाए,

— प्रो (डॉ) शरद नारायण खरे

*प्रो. शरद नारायण खरे

प्राध्यापक व अध्यक्ष इतिहास विभाग शासकीय जे.एम.सी. महिला महाविद्यालय मंडला (म.प्र.)-481661 (मो. 9435484382 / 7049456500) ई-मेल-khare.sharadnarayan@gmail.com