ये कठिन राह है
सवाल उठाने से पहले सोच ले अच्छी तरह,
यदि कर रहा प्रश्न,
बेचैन करने लगी है हकीकत जानने की धुन,
तो भूलना होगा भविष्य की चिंता,गोचर ग्रह,
जो परंपरावादी है उन्हें
ज्यादा भागदौड़ करने की जरूरत ही नहीं,
प्रश्न ही न कौंधे दिमाग के किसी कोने में सही,
जो चल रहा है उसी पर चलने वाले
अत्यधिक भीरू होते हैं,
बताए पर ही हंसते हैं
और बताए पर ही रोते हैं,
तो उन्हें मान वो ज्यादा ज्ञानी है,
उनसे कोई भी उम्मीद बेमानी है,
जिज्ञासा पैदा करती है सवाल,
खोजा परिणाम ला सकता है भूचाल,
भूचाल से व्यवस्था तहस नहस होता है,
कोई पाता है तो कोई रोता है,
परंपरावादी होने से अच्छा है
विज्ञानवादी बन कर रहना,
जहां आसान होता है उंगली उठाना
और अपनी बात शिद्दत से कहना,
पुरातनवादी अपनी पुरातन सोच रखते हैं,
जिज्ञासा का चेहरा कभी भी नोच सकते हैं,
निरंतर खोज नई परिस्थितियां लाता है,
जो विकास की गति को आगे बढ़ाता है,
पाखंड ढोने से बेहतर है
विज्ञान के नजदीक होना,
विकसितता की ओर कदम बढ़ता है
नहीं पड़ता है रोना,
इसीलिए अपने जानने की इच्छा बढ़ाओ,
जानकर दुरूह राहों को सुगम बनाओ।
— राजेन्द्र लाहिरी
