लघु उपन्यास : रघुवंशी भरत (कड़ी 1)
महामंत्री सुमन्त्र से श्री राम के चित्रकूट की ओर निकल जाने का समाचार पाकर महाराज दशरथ श्री राम के वियोग के शोक में विलाप करते हुए सो गये और सोते हुए ही न जाने कब उनके प्राण पखेरू उड़ गये। उनके निकट लेटी हुईं रानियों कौशल्या और सुमित्रा को इसका कोई भान नहीं हुआ। उन्होंने यही समझा कि पहले दिनों की तरह ही महाराज को शोक के कारण मूर्च्छा आ गयी है। वे स्वयं शोक से पीड़ित थीं, इसलिए वे दोनों भी विलाप करती हुई थककर सो गयीं।
प्रभात के समय प्रतिदिन की तरह स्तुतिगान करनेवाले वन्दीजन राजमहल में आये और नित्य की तरह ही विभिन्न मधुर यंत्र बजाकर महाराज तथा उनके पूर्वजों की स्तुति गाने लगे। उनका स्तुतिगान सारे राजमहल में फैल गया, जिससे विभिन्न प्रकार के दास-दासियाँ जग गये। आस-पास के पेड़ों पर बसेरा डालकर सोये हुए पक्षीगण भी जगकर चहचहाने लगे।
सूर्योदय होने पर नित्य की तरह दासियाँ महाराज के लिए पीने योग्य जल, स्नान के लिए जल और वस्त्र आदि तथा दान करने के लिए वस्तुएँ लेकर महाराज के महल में आयीं, तो उनको किसी के जगे न होने पर आश्चर्य हुआ। जिन दासियों को महाराज को स्पर्श करने का अधिकार था, उन्होंने महाराज को जगाने के लिए उनके पैरों का स्पर्श करके देखा तो उनका सारा शरीर ठंडा पड़ा हुआ था। फिर उन्होंने उनके हृदय की धड़कन देखी और नाड़ी की भी परीक्षा की, जो दोनों बन्द मिलीं। इससे उनको निश्चय हो गया कि निद्रावस्था में ही महाराज के प्राण निकल गये हैं।
यह ज्ञान होते ही वे सभी दासियाँ “हा महाराज!” कहती हुईं ज़ोर से रो पड़ीं। उनके रोने की ध्वनि से निकट में ही सोयी हुईं दोनों रानियों की नींद खुल गयी। दासियों का रुदन और महाराज का शरीर शान्त और शीतल देखकर वे भी वास्तविकता समझ गयीं कि महाराज का स्वर्गवास हो गया है। इससे उनके शोक का पारावार नहीं रहा। वे भी बिलखते हुए विलाप करने लगीं। रुदन की ध्वनि सुनकर शीघ्र ही निकट के महल में रहनेवाली कैकेयी भी अपनी दासियों के साथ वहाँ पहुँच गयीं और विलाप करने लगीं।
महारानी कौशल्या ने महाराज दशरथ के सिर को अपनी गोद में रख लिया और रोते-रोते रानी कैकेयी को कोसने लगी- “दुराचारिणी क्रूर कैकेयी! ले, तेरी इच्छा पूरी हुई। अब तू अपना अकंटक राज्य भोग। मेरा पुत्र तो मुझे छोड़कर वन में चला गया और मेरे स्वामी स्वर्ग को चले गये। अब मैं पूरी तरह अबला हो गयी हूँ।” इस तरह बहुत सी बातें कहकर वे विलाप करने लगीं।
महाराज के देहांत का समाचार शीघ्र ही महल में फैल गया। सबसे पहले महामंत्री सुमन्त्र को इसकी सूचना देकर बुलाया गया। उन्होंने फिर अन्य मंत्रियों को बुलाया और गुरु वशिष्ठ को भी सूचना देकर तत्काल आने का निवेदन किया। गुरु वशिष्ठ तथा मंत्रियों ने एकत्र होकर सबसे पहले यह निश्चय किया कि महाराज के शव को तेल से भरे हुए कड़ाह में रख दिया जाये, ताकि वह लम्बे समय तक सुरक्षित रह सके। महाराज का अन्तिम संस्कार तुरन्त नहीं किया जा सकता था, क्योंकि उनको मुखाग्नि देने के लिए उनका कोई पुत्र वहाँ उपस्थित नहीं था और उनमें से किसी के आने तक शव को सुरक्षित रखना आवश्यक था।
शीघ्र ही कुशल सेवकों ने आदेश पाकर महाराज के पार्थिव शरीर को तेल से भरे हुए एक बड़े कड़ाह में रख दिया और उसकी देखभाल तथा सुरक्षा की उचित व्यवस्था कर दी। उस समय शव को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने की इस विधि का ज्ञान था कि किस तेल में रखने पर शव कई दिनों तक विकृत नहीं होता। इसी विधि का उपयोग करके महाराज दशरथ के शव को सुरक्षित कर दिया गया।
तब तक महाराज के देहान्त का समाचार पूरी अयोध्या नगरी में फैल चुका था। इससे समस्त अयोध्या नगरी एक बार फिर गहन शोक में डूब गयी। नगरवासी अनेक प्रकार से शोक मनाने लगे। वे राजमार्गों और चौराहों पर एकत्र होकर एक स्वर से रानी कैकेयी की निन्दा करने लगे और श्री राम को याद करने लगे।
महाराज के शव से भी अधिक सभी को राज्य की सुरक्षा की चिन्ता थी। इसलिए महामंत्री ने आदेश देकर सेनापति को सावधान कर दिया और सेनाओं को किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए तैयार रहने को कह दिया। राजकार्य तो नित्य की तरह मंत्री गण देख ही रहे थे, अब सुरक्षा भी सुदृढ़ कर दी गयी थी, इसलिए नगर में या राज्य में कोई अव्यवस्था उत्पन्न नहीं हुई।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण कृ. 2, सं. 2082 वि. (12 जुलाई, 2025)
