कुमार सोनकरन के दोहे
थे सैनिक के भेष में , आताताई नीच।
धर्म पूछ हमला किए,पहलगाम के बीच।।
आपरेशन सिंदूर त , था ट्रेलर अभ्यास।
झुका न होता पाक तो,निश्चित सत्यानाश।।
क्या इज़राइल को मिला, पाया क्या ईरान?
अमेरिका की चाल पर, मौन पड़ा जहान।।
मिले गरीबों को भला, कैसे यहाँ पनाह।
प्रशासन बना माफिया, सत्ता तानाशाह।।
जनता की चुप्पी बनी, लोकतंत्र की जान।
चंगुल में जकड़ी कहो, जय जय हिन्दुस्तान।।
दु:ख में संगी ना मिले, सुख में मिले हजार।
अवसरवादी यार सब, शुभचिंतक दो चार।।
ना रातों को जागिए, न करिए खूब चैट।
देख मलाई स्वार्थिनी, चट करती बन कैट।।
भले प्रेम-संबंध का, धागा हो बरियार।
मगर टूटती है कहाँ, नफ़रत की दीवार।।
बिना जरूरत के यहाँ, किसे पूछता कौन।
स्वार्थ साधकर आदमी, खा जाता है मौन।।
हुआ संकुचित दायरा,कुछ तो गणित-विचार।
सदियों से पढ़ते यही , दो दूनी बस चार।।
क्या रिश्ता क्या बन्धुता, जाति गले की फाँस।
घुट-घुट कर अब जी रही,मानवता हर साँस।।
डिजिटल युग की पीढ़ियाँ,दिखे क्षुब्ध आसक्त।
प्यार नहीं अब वासना , छलके आँसू – रक्त।।
बोल रही ये सभ्यता, हो नरेन्द्र यह सूच्य।
प्रथम गुरु हैं मात-पिता,साथ गुरूजन पूज्य।।
— नरेन्द्र सोनकर ‘कुमार सोनकरन’
