लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 2)
महाराज दशरथ के शव को सुरक्षित कराने के बाद गुरु वशिष्ठ, मार्कडे, वामदेव, कश्यप, जाबालि आदि ऋषि, सभी मंत्री और श्रेष्ठ ब्राह्मण दरबार में एकत्र हुए और अब क्या करना चाहिए इस पर अपनी-अपनी राय देने लगे। एक मंत्री ंने कहा- “महाराज के पार्थिव शरीर का अन्तिम संस्कार परम्परा के अनुसार उनके ज्येष्ठ पुत्र द्वारा होना चाहिए। परन्तु महाराज के ज्येष्ठ पुत्र श्री राम वन को चले जाने के कारण यहाँ उपस्थित नहीं है और चित्रकूट में रह रहे हैं। इसलिए उनको महाराज की मृत्यु की सूचना देकर बुलाने के लिए कोई दूत चित्रकूट भेज देना चाहिए, ताकि वे आकर महाराज का अन्तिम संस्कार कर सकें और राज्य को भी सँभाल सकें।“
इस पर किसी अन्य मंत्री ने कहा- ”मुझे नहीं लगता कि महाराज के देहान्त का समाचार पाकर भी श्री राम वन से लौट आयेंगे। वे अपने वचन के प्रति बहुत निष्ठावान हैं। इसलिए हमें उनके और लक्ष्मण जी के आने की आशा छोड़ देनी चाहिए।“
तब एक अन्य मंत्री ने कहा- ”भरत जी और शत्रुघ्न जी केकय देश में अपने मामा के यहाँ रह रहे हैं। वे भी यहाँ उपस्थित नहीं है। इसलिए हमें उनको बुलाने के लिए शीघंगामी दूत तत्काल भेज देने चाहिए।“ इस सुझाव पर सभी ने सहमति जतायी।
ऋषि मार्कण्डेय ने कहा- ”इस समय राज्य में कोई राजा नहीं है। बिना राजा वाले राज्य में अनेक प्रकार के उपद्रव और अनर्थ हो सकते हैं। बिना राजा वाले राज्य में धनी लोग सुरक्षित नहीं रह पाते और वैश्य लोग भी निश्चिन्त होकर नहीं सो सकते। राज्य को शत्रुओं का भी भय रहता है और नये शत्रु भी उत्पन्न हो सकते हैं, यहाँ तक कि अवसर पाकर मित्र भी शत्रु बन सकते हैं। इसलिए हमें किसी योग्य व्यक्ति को राजा बना देना चाहिए, ताकि राज्य का शासन सुचारू रूप से चल सके।“
यह सुनकर वहाँ उपस्थित सभी ऋषियों ने महर्षि वशिष्ठ जी से अनुरोध किया कि आप सबसे वरिष्ठ हैं, इसलिए किसी योग्य व्यक्ति को राजा नियुक्त कर दीजिए। उनके वचन सुनकर मुनि वशिष्ठ जी ने कहा- “महाराज दशरथ ने जिन राजकुमार भरत जी को अपना राज्य दिया है, वे ही राजा पद के अधिकारी हैं। वे इस समय राजकुमार शत्रुघ्न के साथ अपने मामा के यहाँ केकय देश में हैं। हमें उनको बुलाने के लिए तेज चलने वाले दूत भेज देने चाहिए। अभी इसके अलावा हम कुछ नहीं कर सकते। राज्य की व्यवस्था पहले की तरह ही मन्त्रिगण देखते रहेंगे और हमने अपनी सेनाओं को भी सतर्क कर दिया है।”
सभी ने इस विचार का समर्थन किया कि शीघ्र ही दूत भेजकर भरत को बुलाया जाये। एक मंत्री ने कहा- ”हमें महाराज के देहान्त के समाचार को सभी से गुप्त रखना चाहिए। दूतों को यह स्पष्ट आदेश दिया जाये कि केकय देश में जाकर भरत जी या अन्य किसी को ऐसा कोई संकेत नहीं देना चाहिए कि श्री राम वन को चले गये हैं या महाराज की मृत्यु हो गयी है।“
मंत्री सुमन्त्र जी ने कहा- ”यह विचार उत्तम है। हमें महाराज की मृत्यु के समाचार को राज्य से बाहर नहीं जाने देना चाहिए। दूतों को भी भरत जी के नाना-मामा आदि के लिए सामान्य भेंट लेकर जाना चाहिए, ताकि उनको ऐसा कोई सन्देह न हो कि अवध के राजपरिवार में किसी की मृत्यु हो गयी है, क्योंकि मृत्यु की सूचना देते समय कोई भेंट आदि नहीं भेजी जाती।“
सभी ने इस विचार का समर्थन किया और कहा कि हाँ, ऐसा ही करना चाहिए। अतः तुरन्त पाँच दूतों को दरबार में बुलाया गया। उनके नाम थे- सिद्धार्थ, विजय, जयन्त, अशोक और नन्दन। राजकुमार भरत जी उन सबसे अच्छी तरह परिचित थे, इसलिए किसी को कोई सन्देह नहीं हो सकता था।
मुनि वशिष्ठ जी ने दूतों को समझाते हुए कहा- “तुम लोग तेज चलने वाले घोड़ों पर सवार होकर तुरन्त केकय देश के राजगृह नगर को जाओ। वहाँ सभी से यहाँ की कुशल मंगल कहना और निवेदन करना कि राजकुमार भरत को गुरु वशिष्ठ और मंत्रियों ने तत्काल बुलाया है। याद रखना कि भरत जी को श्री राम के वन गमन और महाराज की मृत्यु का कोई समाचार या संकेत नहीं देना है, सब कुशल मंगल ही कहना है। तुम्हारे मुख पर भी शोक का कोई चिह्न नहीं होना चाहिए और प्रसन्नता ही झलकनी चाहिए। केकयराज तथा भरत जी को भेंट देने के लिए रेशमी वस्त्र तथा उत्तम आभूषण लेकर तुम सब यहाँ से तुरन्त ही चल दो।“
मुनि वशिष्ठ जी द्वारा इस प्रकार समझाये जाने पर वे सभी दूत केकयराज और भरत जी के लिए रेशमी वस्त्रों की भेंट तथा अपना राहखर्च लेकर तेज चलने वाले अच्छे घोड़ों पर सवार होकर तुरन्त चल दिए।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण कृ. 4, सं. 2082 वि. (14 जुलाई, 2025)
