संघ के शताब्दी वर्ष में स्व का बोध
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विजयादशमी विक्रम संवत् १९८२ अपने स्थापना काल से भारतीय समाज को संगठित कर भारतवर्ष की सर्वांगीण उन्नति का प्रण लेकर निरंतर कार्यरत है। संघ विजयादशमी विक्रम संवत् २०८२ को सौ वर्ष पूर्ण कर शताब्दी वर्ष में पञ्च परिवर्तन पर समाज को साथ लेकर कार्य योजना बना रहा है। प्रथमतः हम पञ्च परिवर्तन के पांच बिंदुओं पर चर्चा करते हैं जो निम्न प्रकार हैं – स्व का बोध, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, नागरिक कर्तव्य। इन पञ्च परिवर्तन का पहला बिन्दु है स्व का बोध यही सबसे महत्वपूर्ण है। जब हम स्व की बात करते हैं तो भारत की परम्परा, रीति- रिवाज, संस्कृति, पर्व- उत्सव, महापुरुष, भाषा, भोजन, भ्रमण, भजन, भवन, भूषा एवं अपने चारों ओर के परिवेश, अपने घर में, समाज में स्वयं के व्यवहार में स्व परिलक्षित होना चाहिए। भारत के स्वतंत्रता संग्राम को जब हम पढ़ते हैं तब यही ध्यान में आता है स्वतंत्रता का पूरा आंदोलन स्व पर आधारित था इसी लिए महात्मा गांधी रामराज्य की बात करते थे, विनायक दामोदर सावरकर हिन्दुत्व की बात करते थे, क्रान्तिकारियों ने विदेशी वस्तुओं की होली जलाई, शिवा जी महाराज ने स्व को ध्यान में रखकर ही हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की, अहिल्याबाई होलकर ने स्व के अंतर्गत ही अनेकों मंदिरों का जीर्णोद्वार कराया, महाराणा प्रताप ने स्व के लिए ही घास की रोटी खाई पर दासता स्वीकार नहीं की, गुरूगोविंद सिंह के चारों बेटे स्वधर्म के लिए बलिदान हो गए पर इस्लाम नहीं स्वीकारा, संघ संस्थापक पूज्य डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने भी इसी स्व को स्थापित करने के लिए ही संघ की स्थापना की। संघ की प्रतिज्ञा में भी पवित्र हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू समाज का संरक्षण, और हिन्दू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने की प्रतिबद्धता के साथ ही संघ के स्वयंसेवक प्रतीज्ञा लेते हैं। इन्हीं प्रतिज्ञाओं को संघ के स्वयंसेवक अपने जीवन में आत्मसात करते हुए आज समाज से भी इस शताब्दी वर्ष में आह्वाहन कर रहे हैं कि हम सभी अपने जीवन में स्व को लागू करें। भारत ने अभी ०२ वर्ष पूर्व आज़ादी का अमृत महोत्सव भी मनाया जिसमें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी यही आवाहन किया था कि इस अमृत महोत्सव में गुलामी के हर अंश से मुक्ति। अब जब हम अपने चारों ओर इस बिन्दु पर नजर डालते हैं तो देखते हैं कि गुलामी की मानसिकता के चिन्ह लोगों के जीवन से निकल नहीं पा रहे हैं जो लोग मंच पर जाकर, समाज के मध्य, स्व जागरण का बोध करते हुए दिखाई देते हैं कभी- कभी उनमें भी कहीं न कहीं आज भी गुलामी के संस्कार दबे हुए हैं। आज स्व के जागरण के लिए निकले लोग भी अपना हस्ताक्षर अंग्रेजी में करते हैं, घर की, दुकान की, कार्यालय की नाम पट्टिका अंग्रेजी में प्रदर्शित करते हैं, अपना व अपने बालकों का जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ ग्रिगेरियन कैलेंडर से मनाते हैं वह भी पाश्चात्य का अंधानुकरण कर केक काटकर व मोमबत्ती बुझाकर, मातृ भाषा के प्रति हीनभावन कभी- कभी हंसी तो तब आती है जब लोग जन्मकुंडली बनवाएंगे भारतीय पञ्चांग से, विवाह का, गृह प्रवेश का, भूमिपूजन का मुहूर्त निकलवाएंगे भारतीय पञ्चांग से पर वर्षगांठ, जन्मदिवस इत्यादि मनाएंगे ग्रिगेरियन कैलेंडर से, यह सब जब हम देखते हैं तो सोचते हैं कि पूज्य डॉक्टर साहब, श्री गुरु जी के संघ में अब कैसे लोग निर्मित हो रहे हैं जो केवल भाषण करते हैं लेकिन जीवन में स्व नहीं निर्मित हो पा रहा है जबकि हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों तक आक्रांताओं से संघर्ष करते रहे किन्तु अपनी संस्कृति, परम्परा को नहीं छोड़ा अपना जन्मदिवस भारतीय पञ्चांग से मनाते रहे अपने हस्ताक्षर उर्दू, फारसी या अंग्रेजी में नहीं किया, कोई पर्व उत्सव आदि कभी पाश्चात्य विदेशी शैली से नहीं अपितु भारतीय कालगणना व सनातन के प्रतीकों का ही प्रयोग किए। इस लिए आज अपनी प्रतिज्ञा में यह भी सम्मिलित करें कि इस शताब्दी वर्ष में सर्वप्रथम अपने व अपने परिवार में स्व के वृहद स्वरूप को लाने का प्रयास करें। इसी स्व के वृहद स्वरूप को भारतीय मान्यताओं, परंपराओं को अंगीकार करेंगे तो टूटते कुटुंब, बिखरता समाज, नष्ट होता पर्यावरण और हमारा नागरिक कर्तव्य सभी कुछ ठीक हो सकता है बस केवल अपने स्व के बोध को उत्तरोत्तर बढ़ाना होगा, वैचारिक समझ विकसित करनी होगी, भारत की आत्मा को समझान होगा, केवल और केवल करना यह है कि भारत को जानो, भारत को मानो, भारत के बनो।
— बाल भास्कर मिश्र
