यह भी तो मंजिल है
तब मैं भी चल पड़ा था राहों में अपनी मंजिल पाने,
खुद के प्रति खुद की जिम्मेदारी निभाने,
मगर राहों में मिले मुझे अनेक ऐसे लोग,
घेरे थे गरीबी सबको और किसी को रोग,
वो जिन्हें मान बैठे थे दैवीय प्रकोप,
मानते रहे थे सब पुण्य-पाप-संजोग,
आगे बढ़ाता हुआ प्रकाश वही बुझ गया,
चलते चलते स्वमेव कदम मेरा रुक गया,
पहले काफी देर तक उन्हें विज्ञान की बात बताया,
काला अक्षर भैंस सा कोई समझ न पाया,
झाड़ फूंक करा रहे धीरे से ठीक हो पायेगा,
झाड़ू वाले बाबा जब इस प्रकोप को मिटाएगा,
किस युग में जी रहे सोच मुझसे न रहा गया,
तकलीफ भोले भालों की जब नहीं सहा गया,
कुछ लोगों को शहर के अस्पताल पंहुचाया,
भर्ती करा सबका तक्षण इलाज कराया,
धीरे धीरे सबकी बाधाएं ढहने लगी,
अब लोगों में इलाज की मानसिकता बहने लगी,
नजर आने लगी अब मुझे मेरी मंजिल,
कराना है सबको हकीकत की दुनिया में दाखिल,
अब सबको जल्द ही बुद्ध,फुले से मिलाना है,
भीम के संविधान में निहित हक़ अधिकार बताना है।
— राजेन्द्र लाहिरी
