आज जिंदगी कल की क्यों आस लगाएं?
कल का कोई ठिकाना नहीं आज जी लेते हैं,
अपने ज़ख्मों को भर लो आनंद उठा लेते हैं।
आपको कोई भी सूचना मृत्यु कभी ना देती,
यमराज का मन जब करता हैं वो उठा लेती।
आत्मा इस शरीर को न जाने कब धोखा दे दें,
यारों ये जीवन जीने को मिला हैं मौका ले लें।
जब तक जिंदगी है इसका आनंद लेते रहिए,
बचपन, जवानी एवं बुढ़ापा सदा मस्त रहिए।
यूँ तो जिंदगी ही अनिश्चितताओं का सागर हैं,
ये संघर्ष और सुख-दुःख से भरी हुई गागर हैं।
रिश्तों की डोर धरे भाई-बहन मदर-फादर है,
एक-दूसरे के प्रति सदा सबके मन आदर हैं।
आज जिंदगी हैं कल की क्यों? आस लगाएं,
हर एक पल “कीमती” जी लें जो मिल जाए।
— संजय एम तराणेकर
