कविता

अडिग शीश झुक रहे हैं

जमाना आ गया कैसा
अहंकारियों का हिय धुक धुक रहा है,
समय का दौर देखो आज
अडिग शीश झुक रहा है,
कथे कहानियां लिख लिख
वो टुकड़े टुकड़े में बांटते रहे,
निष्कंटक राहों में आये
जब जब अछूतता के कांटे
खरपतवार की तरह वो छांटते रहे,
विद्रोह नहीं असहमति का उठा कोई सिर
कंद मूल की तरह वो काटते रहे,
और था वो दौर जब झुकता रहा हर माथा,
बातों में उपदेशों में वो रहे भाग्य विधाता,
हुक्मों में नाफरमानी कभी नहीं होता था,
दबे कुचले दहाड़ मार घरों में रोता था,
कहते रहे स्वयं को वो ज्ञानी ध्यानी,
आस्था की आड़ में होता मनमानी,
मगर आज परिस्थितियां कुछ है और आया,
हर किसी के सर वो दमित छाया,
जो कभी नारों को सुन सुन फन उठाया,
आज सत्ता की चाहत में
इसी नारों को जोर से लगाया,
थकते नहीं जो मार मार अपना डींग,
वो भी जोर से कह चीख रहा जय जय भीम,
नफरती कारखानों में मशीनों का कोई शोर नहीं,
पर मत समझना पुराने मंशों का अब दौर नहीं,
जब तब और पल पल जो दर्द सहे हैं,
उनके ही आगे अडिग शीश आज झुक रहे हैं।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554