लंबी राह का राही हूँ
लंबी राह का राही हूँ, मुझ को चलते जाना है।
मौजी हूँ अपनी हिम्मत का, मेरा नहीं ठिकाना है।
बांधे कफ़न मैं चलता हूँ, किसी से नहीं डरता हूँ।
मुसीबत हैं मेरा साथी, कदम सोच के भरता हूँ।
कांटों से भरा पथ मेरा, मलमल उसे बनाना है।
लंबी राह का राही हूँ, मुझ को चलते जाना है।
जब तक मिले न मंजिल, चलते ही मुझको रहना।
पड़ जाएं पांव में छाले, दुख अपना कभी न कहना।
झुकना नहीं न रुकना मुझे, मन ने यह तो ठाना है।
लंबी राह का राही हूँ, मुझ को चलते जाना है।
आएगी पास यह मंजिल, विश्वास यही है मेरा।
छट जाएगी काली निशा, आएगा नया सवेरा।
क्या कुछ है यहीं हो सकता, कर के मुझे दिखाना है।
लंबी राह का राही हूँ, मुझ को चलते जाना है।
— शिव सन्याल
