मुक्तक/दोहा

दोहे

बिल्ली रस्ता काटती, होती है बदनाम l
मुझको अपना काम है, उसको अपना काम l1l

हिंदी की चौपाल पर, बैठे चार चिराग |
तय था देंगे रौशनी, लगा रहे हैं आग |2|

लेखक तो लेखक हुआ, बेशक झोलाछाप |
पुस्तक तेरी जेब में, जितनी मर्जी छाप|3|

सोते उठते फोन से, होती आँखें चार |
देखो कैसे आ गया, बिस्तर में बाजार |4|

खाली खोखे रह गये,फोकट सारे व्यर्थ|
अर्थ चुराकर ले गया, शब्दों के सब अर्थ|5|

आया है बाजार में, नुस्खा ये नायाब |
रख दो नंगी जांघ पर, बिकने लगे किताब |6|

किस किस से झगड़ा करें, सबके सब हैं चोर |
कोई बेईमान है, कोई रिश्वतखोर |7|

यहाँ वहाँ देखा मिला, बस नंगोँ का देश l
ढकी देह का अब यहाँ, वर्जित हुआ प्रवेश l8l

आफत में राहत मिली, मिलकर हुई डकार|
आधी नेता खा गये, आधी ठेकेदार|9|

कलयुग में -बैल की, पड़ी पेट पर मार l
हीरा मोती घूमते, सड़कों पर बेकार l10l

दो आँसू में बह गए, बैलों के अरमान l
भूस-खली अब कौन दे, कहाँ खेत में धान l11l

खा कर डंडे पीठ पर, भरते दर दर पेट l
कहीं बाघ ने कर लिया, बैलों का आखेट l12l

जब तक पालक थे तभी, तक थे इनके बौस l
आज न पालक है कहीं, और न काँजीहौस l13l

उम्र गंवाई खेत में, फिर भी रहे रखैल l
गायें थी तो जिम गई, कौन जमाता बैल l14l

बरसात पर दोहे
लो बादल ने खोल दी , फिर गठरी की गीठ |
कीचड़ कीचड़ हो गई , पगडण्डी की पीठ | 15|

बिजली देती धमकियाँ , हवा कर रही छेड़ |
बादल के आंसू गिरे , लपक रहे हैं पेड़ |16|

बादल आये देखने, पर्वत जंगल बाग |
दादुर ,झींगुर गा रहे , मिलकर स्वागत राग |17|

भीगे भीगे दिन हुए , गीली गीली रात |
दीप जला कर चल पड़ी , जुगनू की बारात |18|

बादल से बन प्रेम रस , बरस रही है प्रीत |
रिमझिम बूँदें लिख रहीं , जीवन का संगीत |19|

नदियाँ नाले भर गए , भरे समंदर ताल |
शुष्क धरा की पीठ पर , उग आये हैं बाल | 20|

सावन आया बाग़ में , आई मस्त बहार |
अमलतास ने टांग दी , स्वर्णिम वन्दनवार | 21|

धरती को कागज किया , कर सावन को रंग |
बाग़ बगीचे छाप कर , छापे कीट पतंग | 22|

वृक्षों ने धारण किये , हरे हरे से वस्त्र |
फूलों ने कर धर लिए , कंटक रूपी शस्त्र |23|

बांच रही है गाय माँ , बिखरे हैं सर्वत्र |
आया सावन डाकिया , लेकर ढेरों पत्र |24|

नदियाँ नाले भी गढ़े, बिछा गलीचा सब्ज |
सावन ही पहचानता , है कुदरत की नब्ज |25|

होरी सोया खेत में , खड़े किये हैं कान |
मकई की मेड़ पर , जाग रहा है श्वान |26|

बादल बिजली मिल करे , धरा गगन में शोर |
झूम झूम कर नाचता , बलखाता है मोर | 27|

अम्मा का सिर भीगता , भीग रही है गाय |
दोनों का घर एक सा , कौन सुनेगा हाय |28|

अंत समय में पुत्र के, हाथों मिला न नीर |
हलुआ पूरी किस तरह, खाऊं बिना शरीर |29|

जड़ सूखी तो दे रहे, ज्यों पौधे को खाद |
जीते जी पूछा नहीं, किया मरे का श्राद |30|

कलयुग तेरे गर्भ से, प्रकट सहस्रों राम |
स्वयं सिहांसन जा चढ़े, पाँव पखारे आम |31|

पत्थर की शिवलिंग पर, चढ़ा रहा है क्षीर |
अम्मा भूखी मर गई, बिस्तर आँगन तीर |32|

सुबह हुई फिर चल पड़े, ढूंढ रहे सुनसान |
घर में शौचालय नहीं, मंदिर आलिशान |33|

रिश्तों के बाजार में, खड़ी हो गई खाट |
बेटा शहरी हो गया, भूला घर की बाट |34|

सच्चाई कड़वी लगे, कहता ये नाचीज़ |
बच्चों को चुभने लगे, रिश्तों के ताबीज़ |35|

बेरी जी झाड़ी कहे, आओ चुन लो बेर |
ग्वाल बाल खाने लगे, जर्दा और कुबेर |36|

होरी भूखा मर गया, खेत मरे बिन नीर |
गोबर भिखमंगा हुआ, धनिया लीरोंलीर |37|

भेड़ें तो भेड़ें हुई, क्या काली क्या श्वेत |
बेकाबू दोनों चरें, मालिक तेरे खेत |38|

कौन दूध हो पूछते, और कौन सा रक्त |
छांट छांट कर कंजकें, पूज रहे हैं भक्त |39|

कटे फटे कपड़े बने, खानदान पहचान |
आगे पीछे जींस में, कितने रोशनदान |40|

बैठी चार सहेलियां, चारों ही हैं ओन |
हँसी ठिठोली खा गया, नेट और ये फोन |41|

पान मसाला चाब कर, पीक थूकते लाल |
अंदर अंदर खा रहा, मुख में बैठा काल |42|

अम्मा को लिख भेज दो, थोड़ी दुआ सलाम |
उसके तन –मन को लगे, ज्यों केसर बादाम |43|

मोटे चावल में मिला, दिया जरा सा नीर |
माँ के हाथों से बनी, बिना दूध की खीर |44|

अम्मा जल्दी उठ गई, आँगन रही बुहार |
बीन बीन कर रख लिया, सब बच्चों का प्यार |45|

सूरज खिड़की पर खड़ा, चमक रहा है भाल |
अम्मा ने आवाज दी, उठ जा मेरे लाल |46|

हो कर कवि ऋतुराज की, की मैं ने तफ़्तीश l
सरसों की कुछ डालियाँ, मिली झुकाए शीश l47l

एक पढ़े दो घर पढ़े, दो-दो मिलकर चार |
बेटी को पढ़वाइए, पढ़े सकल संसार |48|

बेटा घर की शान तो, बेटी घर का मान |
बेट-बेटी एक है , कर दो ये ऐलान |49|

यह तन गेह कुबेर का, यही अयोध्या धाम |
श्रम बल से धन लक्ष्मी, मर्यादा से राम |50|

दीपक से कह दीजिये, रख रोशन हर धाम |
क्या जाने किस ओर से, आ जाएँ श्री राम |51|

आईं नूतन कोंपलें, नव पल्लव संकेत |
कनक ऋचाएं हो गईं, वेद पृष्ठ हर खेत |52|

जाने वाले साल ने, छूकर सबके पाँव |
ताला-कुंजी सौंप दी, छोड़ दिया है गाँव |53|

गोरी तेरे शर्म से, गाल हो गए लाल |
या होली का रंग है, या यौवन की चाल |54 |

फूल फूल पर है फ़िदा, फूल फूल का यार l
क्यों सबको ही चुभ रहा, फूल फूल का प्यार l55l

आलस आकर घुस गया, घर में चारों ओर l
मन के आँगन में पड़ा, मरा हुआ मन मोर l56l

जब जब हम मिलते रहे, बातें होतीं खूब |
मैं उसका महबूब हूँ, वो मेरा महबूब |57|

अंग्रेजी हँसती रही, होती रही प्रयोग।
हिन्दी गौरव पा गए, अंग्रेजी के लोग।58।

तेरी जड़ तेरी जमीं, उसके सिर पर ताज़ |
हिंदी तेरे देश में, अंग्रेजी का राज |59|

काली झिलमिल ओढ़नी, मुखड़े पर है धूप।
जग सारा मोहित हुआ, तेरा रूप अनूप ।60।

धीरे धीरे हो गए, हम सब भी अखबार।
हम उतरे बाज़ार में, फिर हम में बाज़ार।61|

चैनल को ख़बरें मिलीं, राजनीति को वार।
भारत माँ के नैन को, आँसू बारम्बार।62।

चलो हवा में फेंक दें, हम भी एक सवाल।
मंदिर मस्जिद हैं बड़े, या दो रोटी दाल।63।

चिड़िया बिच्चो खेलती, घूमे सारा गाँव|
बिटिया चप्पल डाल ले, जल जाएंगे पाँव|64|

तू चाहे तो प्यार कर, चाहे तो कर क्लेश |
तेरे ही मन प्रेम है, तेरे ही मन द्वेष |65|

थोड़ा थोड़ा बाँट दूँ, सब को ये सामान |
मेरे दिल में प्रेम है, अधरों पर मुस्कान |66|

मुफ्त नहीं कुछ भी यहाँ, पेड़ लगाओ वीर।
जिसने जितना बिल भरा, पाया उतना नीर।67।

खबर छपी अखबार में, उड़ता रहा मखौल।
जंगल में दो तेंदुए, दहशत का माहौल।68।

हम सब की करतूत है, पल पल बढ़ता घाम।
सूरज तो होता रहा, फोकट में बदनाम।69।

मैं तेरा परिवार हूँ, तू मेरा परिवार।
मेरे रिश्तेदार सब, तेरे रिश्तेदार।70।

अच्छा तुम भी साथ हो, चलो मिलाओ हाथ।
सभी उजाले हो गए, अँधियारे के साथ।71।

जंगल यूँ कंक्रीट का , फैला हुआ अनन्त l
गमले में दुबका मिला , हम को आज वसंत l72l
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— अनन्त आलोक

अनन्त आलोक

नाम - अनन्त आलोक जन्म - 28 - 10 - 1974 षिक्षा - वाणिज्य स्नातक शिक्षा स्नातक, पी.जी.डी.आए.डी., व्यवसाय - अध्यापन विधाएं - कविता, गीत, ग़़ज़ल, हाइकु बाल कविता, लेख, कहानी, निबन्ध, संस्मरण, लघुकथा, लोक - कथा, मुक्तक एवं संपादन। लेखन माध्यम - हिन्दी, हिमाचली एंव अंग्रेजी। विशेष- हि0प्र0 सिरमौर कला संगम द्वारा सम्मानित पर्वतालोक की उपाधि - विभिन्न शैक्षिक तथा सामाजिक संस्थाओं द्वारा अनेकों प्रशस्ति पत्र, सम्मान - नौणी विश्वविद्यालय द्वारा सम्मान व प्रशस्ति पत्र - दो वर्ष पत्रकारिता आकाशवाणी से रचनाएं प्रसारित - दर्जनों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित - काव्य सम्मेलनों में निरंतर भागीदारी - चार दर्जन से अधिक बाल कविताएं, कहानियां विभिन्न बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित प्रकाशन - तलाश (काव्य संग्रह) 2011 संपर्क सूत्र - साहित्यालोक, बायरी, डा0 ददाहू, त0 नाहन, जि0 सिरमौर, हि0प्र0 173022 9418740772, 9816642167