थोड़ा तरस खाओ
निरीह प्राणी शिक्षक को
न समझा जाये भगवान,
सत्ता वालों की नजर में नौकर है
अपनी दुर्गति से वो नहीं अनजान,
हमने देखा है शौच करने वालों की
निगरानी उनको करना पड़ा,
उसने तो ड्यूटी कह मान लिया
जग ने देखा व्यवस्था है पूरा सड़ा,
आफत के समय शिक्षक ही थे
जां लगा दांव ड्यूटी थे किये,
संग पुलिस वालों ने राहगीरों से
भर भर पैसे खुलेआम लिये,
अब वक्त है उनसे ट्रैफिक ड्यूटी कराने का,
उन्हें उनकी औकात बताने का,
कल को नाली साफ करने कहा गया
तो बेझिझक करेंगे,
उन्हें सरकारों का खौफ है
बुरी तरह से डरेंगे,
ऐसा कोई काम नहीं
जिससे शिक्षक डरते हैं,
वो शिक्षा पर ही जीते हैं
और शिक्षा पर ही मरते हैं,
सियासतदानों अपनी हरकतों से बाज आओ,
अपनी लिखी किताबों के
भगवान रूपी शिक्षक पात्रों पर तो
थोड़ा तरस खाओ।
— राजेन्द्र लाहिरी
