भक्ति या आडंबर
वृंदावन की संकरी गलियों में धूप आग उगल रही थी। मंदिर के सामने, आठ साल की गुड़िया माथे पर पसीना और आंखों में चिंता लिए, हर आते-जाते से गिड़गिड़ा रही थी—
“भैया, तिलक लगवा लो न… बस माँ की दवा के लिए पैसे चाहिए।”
लोग आते… चले जाते। कोई नज़रें फेर लेता, कोई जल्दी में आगे बढ़ जाता। गुड़िया की मासूम आवाज़ भीड़ के शोर में खो जाती। थक-हार कर वो मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गई। दो छोटे हाथ जोड़कर भगवान की मूर्ति की ओर देख, रूँधी आवाज़ में बोली —
“हे भगवान, कोई तिलक नहीं लगवाता तो मैं माँ की दवा कैसे लाऊँ? क्या तुम्हें मेरी पुकार सुनाई नहीं देती या तुम सिर्फ बड़े आदमियों की सुनते हो?”
इतना कह गुड़िया बिलख उठी… और उसकी सिसकियाँ मंदिर की घंटियों में गुम होती रहीं।
उसकी करुण पुकार सुन, पास ही परिक्रमा कर रहा एक युवक रुक गया। उसने गुड़िया को देखा—धूल में सनी पर उम्मीद से भरी वो आँखें किसी चमत्कार की राह तक रही थीं।
युवक उसके पास आया, मुस्कराया— “बहना, मुझे तिलक नहीं लगाओगी?”
अविश्वास से गुड़िया ने उसे देखा और फिर युवक को तिलक लगा दिया। युवक ने बिना कुछ कहे उसके हाथ में 200 रुपए रख दिए और भीड़ में अदृश्य हो गया।
बुत्त सी बनी गुड़िया 200 रूपये के नोट को देखती रही। कुछ सेकंड बीतने के पश्चात् वो उसी दिशा में भागी जिस दिशा में वो युवक गया था और काँपती आवाज़ में पुकारने लगी—
“भगवान! किधर गए तुम?… भगवान, किधर गए तुम!”
…. और भीड़ में उस युवक को ढूँढने लगी। उसे पक्का विश्वास था कि भगवान ही इंसानी रूप धरकर उसकी मदद को आए थे।
इधर युवक के कदम भी रुक गए। उसने गुड़िया की ओर देखा और सोचने लगा— “क्या अब तक की मेरी पूजा, व्रत, तीर्थ—सब आडंबर था? आज किसी मासूम की मदद कर मुझे असीम शान्ति मिली है। शायद दूसरों की सेवा करना ही सच्ची भक्ति है।”
वो युवक भी किसी का भगवान बन, आज अपने भगवान को पा चुका था।निःसंदेह— ईश्वर वही है, जो किसी की पुकार का जवाब बन जाए। और भक्ति वही… जो इंसानियत के चेहरे पर मुस्कान बनकर उभरे।
— अंजु गुप्ता ‘अक्षरा’
