औरत
क़ुदरत है अगर नज़म तो उन्वान हैं औरत,
हर ज़ात की दरअसल निगहबान हैं औरत,
मरियम कहीं ज़ेहरा कहीं दुर्गा कहीं सीता,
ताक़त कहीं सीरत कहीं शान हैं औरत,
ये किसने कहा इसको समझ पाना हैं मुश्किल,
बस प्यार से समझो तो बड़ी आसान हैं औरत,
मां कहके इसके पांव में जन्नत दी खुदा ने,
अब जान ले किस दर्जे तेरा मान हैं औरत,
हर शख्स के हिस्से में ये ले आती हैं रौनक,
पर अपने ही अंदर बड़ी वीरान हैं औरत,
हर दौर ने इसको कभी बेचा कभी लूटा,
अफसोस हर वक़्त कितनी परेशान हैं औरत।
— आसिया फारूकी
